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Monday, July 15, 2019

फाइलेरिया के कारण लक्षण और उसके घरेलू उपाय,What is Filaria in Hindi,

फाईलेरिया रोग का इलाज संभव है। अगर इसका इलाज प्रारंम्भिक अवस्था में हो जाय तो संक्रमण को फैलने से रोका जा सकता है। फाइलेरिया रोग में अकसर हाथ या पैर बहुत ही ज़्यादा सूज जाते हैं। इसलिए इस रोग को हाथी पांव भी कहते हैं। पर फाइलेरिया रोग से पीड़ित हर व्यक्ति के हाथ या पैर नहीं सूजते। यह बीमारी पूर्वी भारत, मालाबार और महाराष्ट्र के पूर्वी इलाकों में बहुत अधिक फैली हुई है।
  • यह कृमिवाली बीमारी है। यह कृमि लसिका तंत्र की नलियों में होते हैं और उन्हें बंद कर देते हैं। क्यूलैक्स मच्छर के काटने से बहुत छोटे आकार के कृमि शरीर में प्रवेश करते हैं। मलेरिया के कीड़ों की तरह यह कीड़े मनुष्यों और मच्छरों दोनों में छूत पैदा करते हैं फाइलेरिया (Lymphatic Filariasis) एक परजीवीजन्य संक्रामक बीमारी है जो धागे जैसे कृमियों से होती है। वैश्विक स्तर पर इसे एक उपेक्षित उष्णकटिबंधीय बीमारी (Neglected Tropical Disease) माना जाता है। 
  • फाइलेरिया दुनिया भर के उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय देशों में एक गंभीर स्वास्थ्य समस्या है। जिसमें भारत भी शामिल है। विश्व में लगभग 1.3 अरब लोगों को इस बीमारी के संक्रमण का खतरा है और लगभग 12 करोड़ लोग इससे वर्तमान में संक्रमित हो चुके हैं, जिनमें से लगभग 4 करोड़ लोग इस बीमारी की वजह से किसी विकृति का शिकार हो गए हैं या अक्षम हो चुके हैं।
  • फाइलेरिया 2.5 करोड़ से ज्यादा पुरुषों को जननांग के विकार और 1.5 करोड़ से ज्यादा लोगों को सूजन से प्रभावित कर चुका है। हाथीपांव (Elephantiasis) फाइलेरिया का सबसे सामान्य लक्षण है जिसमें शोफ (Oedema) के साथ चमड़ी तथा उसके नीचे के ऊतक मोटे हो जाते हैं।

क्या हैं फाइलेरिया के लक्षण,filaria symptoms

इस तथ्य का अभी तक सटीक आकलन नहीं किया जा सका है कि संक्रमण के बाद फाइलेरिया के लक्षण प्रकट होने में कितना समय लगता है। हालांकि मच्छर के काटने के 16-18 महीनों के पश्चात बीमारी के लक्षण प्रकट होते हैं। फाइलेरिया के ज्यादातार लक्षण और संकेत वयस्क कृमि के लसीका तंत्र में प्रवेश के कारण पैदा होते हैं
  • कृमि द्वारा ऊतकों को नुकसान पहुंचाने से लसीका द्रव का बहाव बाधित होता है जिससे सूजन, घाव और संक्रमण पैदा होते हैं। पैर और पेड़ू सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले अंग हैं। फाइलेरिया का संक्रमण सामान्य शारीरिक कमजोरी, सिरदर्द, मिचली, हल्के बुखार और बार-बार खुजली के रूप में प्रकट होता है।
  • फाइलेरिया कभी-कभार ही जानलेवा साबित होता है, हालांकि इससे बार-बार संक्रमण, बुखार, लसीका तंत्र में गंभीर सूजन और फेफड़ों की बीमारी ‘ट्रॉपिकल पल्मोनरी इओसिनोफीलिया (Tropical Pulmonary Eosinophilia) हो जाती है। ट्रॉपिकल पल्मोनरी इओसिनोफीलिया के लक्षणों में खांसी, सांस लेने में परेशानी और सांस लेने में घरघराहट की आवाज होती है। लगभग 5 प्रतिशत मामलों में पैरों में सूजन आ जाती है जिसे फ़ीलपांव अथवा हाथीपांव कहते हैं। फाइलेरिया से गंभीर विकृति, चलने-फिरने में परेशानी और लंबी अवधि की विकलांगता हो सकती है।
  • फाइलेरिया के कारण हाइड्रोसील (Hydrocoele) भी हो सकता है। मरीज के वृषणकोष (Scrotum) में सूजन भी आ सकती है जिसे ‘फाइलेरियल स्क्रोटम’ (Filarial scrotum) कहा जाता है। कुछ मरीजों में मूत्र का रंग दूधिया हो जाता है। महिलाओं में वक्ष या बाह्य जननांग भी प्रभावित होते हैं। कुछ मामलों में पेरिकार्डियल स्पेस (हृदय और उसके झिल्लीदार आवरण के बीच की जगह) में भी द्रव जमा हो जाता है।

फाइलेरिया के कौन से कारक जीव

फाइलेरिया, फाइलेरियोडिडिया (Filariodidea) कुल के नेमैटोडों (गोलकृमि) के संक्रमण से होता है। तीन प्रकार के कृमि इस बीमारी को जन्म देते हैं। ये हैं वुचिरेरिया बैंक्राफ्टाई (Wuchereria bancrofti), ब्रुजिया मलाई (Brugia malayi) औरब्रुजिया टिमोरीई (Brugia timori)। वुचिरेरिया बैंक्राफ्टाई इस बीमारी का सबसे सामान्य कारक है जो पूरे विश्व में पाया जाता है।
  • ब्रुजिया मलाई दक्षिण-पश्चिम भारत, चीन, इंडोनेशिया, मलेशिया, दक्षिण कोरिया, फिलिपींस और वियतनाम में पाया जाता है जबकि ब्रुजिया टिमोराई सिर्फ इंडोनेशिया तक ही सीमित है। 
  • वुचिरेरिया बैंक्राफ्टाई में नर कृमि 40 मिलीमीटर लंबा होता है जबकि मादा की लंबाई लगभग 50-100 मिलीमीटर होती है।
  • फाइलेरिया भारत में एक प्रमुख स्वास्थ्य समस्या है। यह संक्रामक बीमारी देश के राज्यों उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, तमिलनाडु, गुजरात, केरल एवं केन्द्र शासित प्रदेशों लक्षद्वीप और अंडमान निकोबार में स्थाई रूप से उभरती रहती है। 
  • भारत में मुख्य तौर पर फाइलेरिया के दो प्रकार के संक्रमण होते हैं, एक वुचिरेरिया बैंक्राफ्टाई से और दूसरा ब्रुजिया मलाई से। वुचिरेरिया बैंक्राफ्टाई के संक्रमण से होने वाला बैंक्रोफ्टियन फाइलेरिया (Bancroftian filaria) भारत में फाइलेरिया के कुल मामलों का लगभग 98 प्रतिशत होता है

कैसे फैलता है फाइलेरिया

  • फाइलेरिया मच्छरों से फैलता है जो परजीवी कृमियों के लिए रोगवाहक का काम करते हैं। 
  • इस परजीवी के लिए मनुष्य मुख्य पोषक है जबकि मच्छर इसके वाहक और मध्यस्थ पोषक हैं। 
  • कृमि प्रभावित क्षेत्रों से लोगों का रोजगार की तलाश में बाहर जाना, शहरीकरण, औद्योगिकीकरण, अज्ञानता, आवासीय सुविधाओं की कमी और स्वच्छता की अपर्याप्त स्थिति से यह संक्रमण फैलता है। 
  • संक्रमण के बाद कृमि के लार्वा संक्रमित व्यक्ति की रक्तधारा में बहते रहते हैं जबकि वयस्क कृमि मानव लसीका तंत्र में जगह बना लेता है। एक वयस्क कृमि की आयु सात वर्ष तक हो सकती है।
  •  संक्रमित मच्‍छर के काटने से इसके कीड़े फैलते है। जब मनुष्‍य बच्‍चा होता है तो आम तौर पर संक्रमण आरंभ हो जाता है। तीन प्रकार के कीड़े होते है जिनके कारण बीमारी फैलती है: Wuchereria bancrofti, Brugia malayi, और Brugia timori. Wuchereria bancrofti यह सबसे सामान्‍य है। यह कीड़ा lymphatic system को नुकसान पहुंचाता है।
  •  रात के समय एकत्रित किए गए खून को, एक प्रकार के सूक्ष्‍मदर्शी के द्वारा देखने पर इस बीमारी का पता चलता है। खून को thick smear के रूप में और Giemsa के साथ दाग के रूप में होना चाहिए।. बीमारी के विरूद्ध एंटीबाडियों हेतु खून की जांच भी की जा सकती है।
  • यह शोथ न्यूनाधिक होता रहता है, परंतु जब ये कृमि अंदर ही अंदर मर जाते हैं, तब लसीकावाहिनियों का मार्ग सदा के लिए बंद हो जाता है और उस स्थान की त्वचा मोटी तथा कड़ी हो जाती है। लसीका वाहिनियों के मार्ग बंद हो जाने से यदि अंग फूल जाएँ, तो कोई भी औषध ऐसी नहीं है जो अवरुद्ध लसीकामार्ग को खोल सके। 
  • कभी कभी किसी किसी रोगी में शल्यकर्म द्वारा लसीकावाहिनी का नया मार्ग बनाया जा सकता है। इस रोग के समस्त लक्षण फाइलेरिया के उग्र प्रकोप के समान होते हैं।

फाइलेरिया का घरेलू इलाज

इलाज बीमारी की शुरुआती अवस्था में ही शुरु हो जाना चाहिए। याद रखना चाहिए कि हाथों या पैरों की सूजन ठीक करने के लिए हमारे पास कोई भी दवाई नहीं है। डाईइथाइल – कार्बामाज़ीन (DEC) फाइलेरिया की एक दवा है। इसे दो हफ्तों दिया जाना चाहिए। इस दवा से सिर में दर्द, मितली, उल्टी जैसी प्रतिक्रियाएं हो सकती हैं। कभी कभी इससे एलर्जी भी हो जाती है। आप इसके बारे में और अधिक दवाइयों वाले अध्याय में पढ़ सकते हैं।

फाइलेरिया पर नियंत्रण या रोकथाम phayaleriya-check फायलेरिया जॉंच के लिये खून का नमूना रात में लेना पडता है इस बीमारी कृमि के कई एक वाहक इलाज के लिए नहीं पहुँचते। इसलिए संक्रमणग्रस्त इलाकों में सभी की जांच ज़रूरी है। ऐसा न होने पर बीमारी फैलती जाती है। जिन क्षेत्रों में फाइलेरिया की समस्या हो वहॉं खास सर्वे किए जाने ज़रूरी होते हैं। फाइलेरिया के नियंत्रण के लिए रात को खून के आलेप के नमूने इकट्ठे करना, रोकथाम के लिये दवा प्रयोग और बीएचसी छिडकाकर मच्छरों पर नियंत्रण करना जैसे कदम उठाना ज़रूरी है। जिन क्षेत्रों में फाइलेरिया की बीमारी ज़्यादा होती है वहॉं नमक में DEC दवा मिलाना ठीक रहता है। इससे यह सुनिश्चित हो जाता है कि हर व्यक्ति को यह दवा मिल जाए (कम मात्रा में) और इससे सूक्ष्म फाइलेरिया कृमि को मारा जा सकता है।

ये सूक्ष्म फाइलेरिया कृमि खून में घूमते रहते हैं। ऐसा खासकर रात को होता है। क्यूलैक्स मच्छर जब खून चूसता है तो वो इन सूक्ष्म फाइलेरिया को अपने अंदर ले लेता है। और संक्रमण पैदा करने वाले लार्वा के रुप में इनका विकास 10 से 15 दिनों के अंदर होता है। इस अवस्था में मच्छर बीमारी पैदा करने वाला होता है। इस तरह यह चक्र चलता रहता है।

Thursday, January 11, 2018

दांत के दर्द का प्राकृतिक उपचार, Home Remedies for Teeth Pain in Hindi,



प्राकृतिक उपचार दंत पीडा में लाभकारी होते हैं। सदियों से हमारे बडे-बूढे दांत के दर्द में घरेलू पदार्थों का उपयोग करते आये हैं। यहां हम ऐसे ही प्राकृतिक उपचारों की चर्चा कर रहे हैं। असल में दांतों से जुड़ी हर समस्या के पीछे हमारी गलत खानपान और रहन-सहन की आधुनिक जीवन शैली है। चाय-कॉफी जैसे बेहद गर्म पेय तथा कोलड्रिक्स दोनों ही दांतों की जड़ों को कमजोर और खोखला कर देते हैं। सात्विक, ताजा तथा प्राकृतिक खानपान और सफाई के प्रति जागरूकता ही हमें दातों की समस्या से स्थाई छुटकार दिला सके। 
दांतों में दर्द होना बहुत ही आम बात है, लेकिन यह दर्द असहनीय होता है। हम दांतों की बहुत सारी तकलीफों से बच सकते अगर हम उनका धयान रखें। दांतों के दर्द से निवारण के लिए आप नीचे दिए गए Gharelu Nuskhe अपना सकते हैं।

 दांत के दर्द का प्राकृतिक उपचार, Home Remedies for Teeth Pain in Hindi,

    • कच्चा प्याज दांत के दर्द के लिए सबसे प्रभावशाली Gharelu Upchar है। एक ताज़ा प्याज काट कर दांतों पर 3 मिनट के लिए रगड़े। इससे दांतों के दर्द में आराम मिलेगा।
    • हींग दांतों के दर्द के लिए बहुत लाभदायक Gharelu Nuskhe में से एक है। जब भी दांत में दर्द हो तो हींग को मौसमी के रस में मिलाये और फिर रुई में लेकर उस रुई को दर्द करने वाले दांत पर रख दीजिये, इससे आपको दर्द से तुरंत निजात मिलेगी।
    • मसूड़े पर काली मिर्च के पाउडर को रगड़े, इससे मसूड़े सुन्न हो जायेंगे और दर्द काम हो जायेगा। यह gharelu upchar दांतों के लिए बहुत लाभदायक है।
    • बर्फ के टुकड़े से मसूड़े की सिकाई करें।
    • 5gm लौंग, 3gm कपूर को बारीक पीस कर दत्तो पर मलने से आराम मिलेगा। लौंग का तेल दांतों में लाएं, लेकिन धयान रहे की तेल मसूड़ों पर न लगे क्योंकि मसूड़े पर लगाने से उन पर जलन होती है।
    • लहसुन की एक लौंग चबाना भी दांतों के दर्द के लिए बहुत प्रभावी है।जिस दांत में दर्द हो उसके पास एक लौंग रखें। इससे दांत के दर्द में आराम आएगा।जिस दांत में दर्द हो, Vicks को अपने चेहरे के उस भाग पर लगाएं और किसी रुमाल से धक लें। Vicks की ऊष्मा से आपका दांतों का दर्द खत्म हो जायेगा 
    • टमाटर का सेवन करें, इससे दांत स्वस्थ और साफ़ रहते हैं। दांतों के दर्द में नमकीन पानी से गरारे करना बहुत लाभदायक है। हल्दी और सरसों के तेल को मिला कर दांतों का मंजन करें। दांत में दर्द होने पर, मीठा न खाए क्योंकि मीठा खाने से बैक्टीरिया और जर्म्स और भी ज्यादा बढ़ते है।
    • कैल्शियम और प्रोटीन युक्त खाने का सेवन करें। ताज़े आम के पत्तों को चबाएं और थूक दें।
    • दो ग्राम हींग नींबू के रस में पीसकर पेस्ट जैसा बनाले। इस पेस्ट से दंत मंजन करते रहने से दंतशूल का निवारण होता है।१२। मेरा अनुभव है कि विटामिन सी ५०० एम.जी. दिन में दो बार और केल्सियम ५००एम.जी दिन में एक बार लेते रहने से दांत के कई रोग नियंत्रित होंगे और दांत भी मजबूत बनेंगे।
    • मुख्य बात ये है कि सुबह-शाम दांतों की स्वच्छता करते रहें। दांतों के बीच की जगह में अन्न कण फ़ंसे रह जाते हैं और उनमें जीवाणु पैदा होकर दंत विकार उत्पन्न करते हैं।
    • शकर का उपयोग हानिकारक है। इससे दांतो में जीवाणु पैदा होते हैं। मीठी वस्तुएं हानिकारक हैं। लेकिन कडवे,ख्ट्टे,कसेले स्वाद के पदार्थ दांतों के लिये हितकर होते है। नींबू,आंवला,टमाटर ,नारंगी का नियमित उपयोग लाभकारी है। इन फ़लों मे जीवाणुनाशक तत्व होते हैं। मसूढों से अत्यधिक मात्रा में खून जाता हो तो नींबू का ताजा रस पीना लाभकारी है। हरी सब्जियां,रसदार फ़ल भोजन में प्रचुरता से शामिल करें।
    • दांतों की केविटी में दंत चिकित्सक केमिकल मसाला भरकर इलाज करते हैं। सभी प्रकार के जतन करने पर भी दांत की पीडा शांत न हो तो दांत उखडवाना ही आखिरी उपाय है।
     दांतों में पस मुख्य रूप से मसूड़ों में जलन और टूटे हुए दांत के कारण होता है। दांतों में पस मुख्य रूप से एक प्रकार का संक्रमण होता है जो मसूड़ों और दांतों की जड़ों के बीच होता है तथा इसके कारण बहुत अधिक दर्द होता है। इसके कारण दांत के अंदर पस बन जाता है जिसके कारण दांत में दर्द होता है।

    जिस दांत में पस हो जाता है उसमें बैक्टीरिया प्रवेश कर जाता है और वही बढ़ता रहता है जिससे उन हड्डियों में संक्रमण हो जाता है जो दांतों को सहारा देती हैं। यदि समय पर इसका उपचार नहीं किया गया तो इसके कारण जीवन को खतरा हो सकता है।

      Thursday, November 09, 2017

      पैर के मोच को कैसे ठीक करे,Home Remedies for a Sprained Ankle in Hindi,

      पैरों में मोच या फिर खिंचाव आने पर काफी सूजन और दर्द पैदा हो जाता है। यह कभी भी हो सकता है, चाहे आप खेल-कूद में लीन हो या फिर चलते चलते पैर मुड़ जाए। कई बार काम करते समय, खेलते कूदते सीढ़ी चढ़ते हमें यह मालूम ही नहीं हो पाता कि हमारे हाथ-पाँव या कमर में मोच लग गई है, लेकिन कुछ समय बाद उस जगह दुःखने पर हमें यह पता लगता है। मोच आने पर उस अंग पर सूजन आ जाती है और काफी दर्द होने लगता है , अगर आपको असहनीय दर्द या ज्यादा परेशानी है तो आप तुरंत डॉक्टर को दिखाएँ ,लेकिन यदि मोच छोटी है तो आप उस का घरेलू उपचार भी कर सकते है ।

      मोच, चोट और सूजन के कारण

      • मोच व चोट लगने का सबसे पहला कारण हमारी असावधानी हो सकती हैं. जैसे कई बार हम इतनी जल्दबाजी में होते हैं की हम सडक को पार करते हुए ध्यान ही नहीं देते और किसी दुर्घटना का शिकार हो जाते हैं
      • अधिक शारीरिक व्यायाम करने के कारण भी कई बार हमारे शरीर में मोच या अंदरूनी चोट लग जाती हैं. जिसका पता हमें व्यायाम करते समय नहीं चलता क्यूंकि व्यायाम करने से हमारे शरीर गरम हो जाता हैं.
      • बच्चों को अधिक चोट या मोच खेलते समय लगती हैं. 
      • अधिक तेजी से वाहन चलाने की वजह से भी कई बार लोगों को  चोट लग जाती हैं.

      मोच, चोट और सूजन के लक्षण

      • चोट या मोच लगने पर जिस भाग में चोट लगी हैं. वहां पर सूजन आ जाना.
      • चोट एवं मोच वाले स्थान में दर्द होना. 
      • चोट या मोच आने पर जिस भाग में चोट लगी हैं उसके आस – पास जलन होना.
      • चोट व मोच से प्रभावित त्वचा का लाला हो जाना.
      • अधिक चोट लगने पर खून बहना.
      • मोच आने पर त्वचा का रंग नीला हो जाना

      मोच, चोट और सूजन के लिए घरेलू उपाय,पैर के मोच को कैसे ठीक करे,Home Remedies for a Sprained Ankle in Hindi,

      • आक के पत्तों को गरम करके बाँधने से चोट अच्छी हो जाती है। सूजन दूर हो जाती है।
      • चोट के कारण कटे हुए स्थान पर पिसी हुई हल्दी भर देने से खून का बहना बंद हो जाता है तथा हल्दी कीटाणुनाशक भी होती है।
      • चोट व मोच के दर्द से राहत पाने के लिए तुलसी के पत्तों का उपयोग करना बहुत ही उपयोगी होता हैं. चोट व मोच को ठीक करने के लिए तुलसी के पत्ते लें और उसे पीस लें. अब इन पत्तियों के लेप को अपनी चोट व मोच पर लगा लें. इस लेप का प्रयोग करने से घाव जल्दी ही ठीक हो जाएगा तथा मोच भी ठीक हो जाएगी.
      • 2 कली लहसुन, 10 ग्राम शहद, 1 ग्राम लाख एवं 2 ग्राम मिश्री इन सबको चटनी जैसा पीसकर, घी डालकर देने से टूटी हुई अथवा उतरी हुई हड्डी जल्दी जुड़ जाती है।
      • लकड़ी-पत्थर आदि लगने से आयी सूजन पर हल्दी एवं खाने का चूना एक साथ पीसकर गर्म लेप करने से अथवा इमली के पत्तों को उबालकर बाँधने से सूजन उतर जाती है।
      • यदि आप के पैर में मोच आ गई है तो आप तेजपात को पीसकर मोच वाले स्थान पर लगायें ।
      • मोच अथवा चोट के कारण खून जम जाने एवं गाँठ पड़ जाने पर बड़ के कोमल पत्तों पर शहद लगाकर बाँधने से लाभ होता है।
      • अगर आपके पैर या हाथ में मोच आ गई है तो बिना देर किए थोडा सा बर्फ एक कपड़े में रखकर सूजन वाले जगह पर लगायें इससे सूजन कम हो जाता है। बर्फ लगाने से सूजन वाले जगह पर रक्त का संचालन अच्छी तरह से होने लगता है जिससे दर्द धीरे-धीरे कम होने लगता है।
      • हल्दी और सरसों के तेल को मिला लें और इसे हल्की आंच में गर्म करके फिर इसे मोच वाली जगह पर लगाएं और किसी कपड़े से इसे ढक दें।
      • अरनी के उबाले हुए पत्तों को किसी भी प्रकार की सूजन पर बाँधने से तथा 1 ग्राम हाथ की पीसी हुई हल्दी को सुबह पानी के साथ लेने से सूजन दूर होती
      • पका हुआ लहसुन और अजवायन को सरसों के तेल में मिलाकर गर्म करें। और फिर इस तेल की मालिश मोच वाले हिस्से पर करें। आपको राहत मिलेगी।
      • महुआ और तिल को कपड़े में बांध कर लगाने से हड्डी की मोच ठीक हो सकती है।
      • 1 से 3 ग्राम हल्दी और शक्कर फाँकने और नारियल का पानी पीने से तथा खाने का चूना एवं पुराना गुड़ पीसकर एकरस करके लगाने से भीतरी चोट में तुरंत लाभ होता है|
      • एलोवेरा के गूदे को सूजन और मोच वाली जगह पर लगाने से आराम मिलता है।
      • इमली की पत्तियों को पीसें और इसे आग में थोड़ा गुनगुना करें। और इसे मोच वाली जगह पर लगाने से दर्द से तुरंत राहत मिलती है।
      • ढ़ाक के गोंद को पानी में मिलाकर उसका लेप करने से चोट में सूजन सही हो जाती है ।
      • मोच को ठीक करने का एक और कारगर उपाय यह है कि आप अनार के पत्ते पीसकर मोच वाली जगह पर मलें।
      • चोट किसी भी स्थान पर लगी हो तो आप कपूर और घी की बराबर मात्रा में मिलाकर चोट वाले स्थान पर कपडे से बांधे एैसा करने से चोट का दर्द कम हो जाता है तथा रक्त बहना भी बंद हो जाता है।
      • सरसों के तेल में नमक को मिला लें और इसे गर्म करके मोच वाली जगह पर लगाएं। एैसा करने मोच में राहत मिलती है।
      • हाथ पैरों की ऐठन और पैर की मोच पर अखरोट का तेल लगाने से दर्द से राहत मिलती है।
      • चूने को शहद के साथ मिला लें और इससे मोच वाली जगह पर आराम से मालिश करें। इस उपाय से भी मोच में बहुत राहत मिलती है।
      • मोच को ठीक करने के लिए सरसों के तेल का प्रयोग करना बहुत ही लाभकारी सिद्ध होता हैं. मोच से जल्दी राहत पाने के लिए सरसों के तेल को मोच वाले स्थान पर लगा लें और इस पर हल्दी का पाउडर छिडक लें. हल्दी को छिडकने के बाद मोच को तौलिए से ढक दें. अब एक पोटली लें और उसमे नमक डाल लें और इसे बांध लें. अब इस पोटली को तवे पर गर्म करके तौलिए के उपर से गर्माहट सहन करने लायक सिकाई कर लें. आपकी मोच ठीक हो जाएगी.

      Monday, May 15, 2017

      मोतियाबिंद का घरेलू इलाज-Glaucoma Treatment in Ayurveda in Hindi,

      मोतियाबिंद का घरेलू इलाज-Glaucoma Treatment in Ayurveda in Hindi,

      Glaucoma Treatment in Ayurveda in Hindi

      मोतियाबिंद रोग कई कारणों से होता है। आंखों में लंबे समय तक सूजन बने रहना, जन्मजात सूजन होना, आंख की संरचना में कोई कमी होना, आंख में चोट लग जाना, चोट लगने पर लंबे समय तक घाव बना रहना, कनीनिका में जख्म बन जाना, दूर की चीजें धूमिल नजर आना या सब्जमोतिया रोग होना, आंख के परदे का किसी कारणवश अलग हो जाना, कोई गम्भीर दृष्टि दोष होना, लंबे समय तक तेज रोशनी या तेज गर्मी में कार्य करना, डायबिटीज होना, गठिया होना, धमनी रोग होना, गुर्दे में जलन का होना, अत्याधिक कुनैन का सेवन, खूनी बवासीर का रक्त स्राव अचानक बंद हो जाना आदि समस्याएँ मोतियाति‍बिंद को जन्म दे सकती हैं।

      मोतियाबिंद के प्रकार

      रक्त मोतियाबिंद में सभी चीजें लाल, हरी, काली, पीली और सफेद नजर आती हैं। परिम्लामिन मोतियाबिंद में सभी ओर पीला-पीला नजर आता है। ऐसा लगता है जैसे कि पेड़-पौधों में आग लग गई हो।सभी प्रकार के मोतियाबिंद में आंखों के आस-पास की स्थिति भी अलग-अलग होती है। वातज मोतियाबिंद में आंखों की पुतली लालिमायुक्त, चंचल और कठोर होती है।

      पित्तज मोतियाबिंद में आंख की पुतली कांसे के समान पीलापन लिए होती है। कफज मोतियाबिंद में आंख की पुतली सफेद और चिकनी होती है या शंख की तरह सफेद खूँटों से युक्त व चंचल होती है। सन्निपात के मोतियाबिंद में आंख की पुतली मूंगे या पद्म पत्र के समान तथा उक्त सभी के मिश्रित लक्षणों वाली होती है। परिम्लामिन में आंख की पुतली भद्दे रंग के कांच के समान, पीली व लाल सी, मैली, रूखी और नीलापन लिए होती है।

      मोतियाबिंद का आयुर्वेदिक इलाज-

      आयुर्वेद में हरड़ , बहेड़े और आमले - इन तीनों को त्रिफला कहते हैं । यह त्रिदोषनाशक है अर्थात् वात, पित्त, कफ इन तीनों दोषों के कुपित होने से जो रोग उत्पन्न होते हैं उन सबको दूर करने वाला है । कभी-कभी स्वस्थ मनुष्यों को भी त्रिफला के जल से अपने नेत्र धोते रहना चाहिये ।

      धोने की विधि - त्रिफला को जौ से समान (यवकुट) कूट लो और रात्रि के समय किसी मिट्टी, शीशे वा चीनी के पात्र में शुद्ध जल में भिगो दो । दो तोले वा एक छटांक त्रिफला को आधा सेर वा एक सेर शुद्ध जल में भिगोवो । प्रातःकाल पानी को ऊपर से नितारकर छान लो । उस जल से नेत्रों को खूब छींटे लगाकर धोवो । सारे जल का उपयोग एक बार के धोने में ही करो । इससे निरन्तर धोने से आंखों की उष्णता, रोहे, खुजली, लाली, जाला, मोतियाबिन्द आदि सभी रोगों का नाश होता है । आंखों की पीड़ा (दुखना) दूर होती है, आंखों की ज्योति बढ़ती है ।शेष बचे हुए फोकट सिर पर रगड़ने से लाभ होता है ।
      • त्रिफला को जल के साथ पीसकर टिकिया बनायें और आंखों पर रखकर पट्टी बांध दें । इससे तीनों दोषों से दुखती हुई आंखें ठीक हो जाती हैं ।
      • हरड़ की गिरी (बीज) को जल के साथ निरन्तर आठ दिन तक खरल करो । इसको नेत्रों में डालते रहने से मोतियाबिन्द रुक जाता है । यह रोग के आरम्भ में अच्छा लाभ करता है ।
      • मोतियाबिंद की शुरुआती अवस्था में भीमसेनी कपूर स्त्री के दूध में घिसकर नित्य लगाने पर यह ठीक हो जाता है।
      • हल्के बड़े मोती का चूरा 3 ग्राम और काला सुरमा 12 ग्राम लेकर खूब घोंटें। जब अच्छी तरह घुट जाए तो एक साफ शीशी में रख लें और रोज सोते वक्त अंजन की तरह आंखों में लगाएं। इससे मोतियाबिंद अवश्य ही दूर हो जाता है।
      • छोटी पीपल, लाहौरी नमक, समुद्री फेन और काली मिर्च सभी 10-10 ग्राम लें। इसे 200 ग्राम काले सुरमा के साथ 500 मिलीलीटर गुलाब अर्क या सौंफ अर्क में इस प्रकार घोटें कि सारा अर्क उसमें सोख लें। अब इसे रोजाना आंखों में लगाएं।
      • 10 ग्राम गिलोय का रस, 1 ग्राम शहद, 1 ग्राम सेंधा नमक सभी को बारीक पीसकर रख लें। इसे रोजाना आंखों में अंजन की तरह प्रयोग करने से मोतियाबिंद दूर होता है।
      • मोतियाबिंद में उक्त में से कोई भी एक औषधि आंख में लगाने से सभी प्रकार का मोतियाबिंद धीरे-धीरे दूर हो जाता है। सभी औषधियां परीक्षित हैं।
      • नेत्र रोगों में कुदरती पदार्थों से ईलाज करना फ़ायदेमंद रहता है। मोतियाबिंद बढती उम्र के साथ अपना तालमेल बिठा लेता है। अधिमंथ बहुत ही खतरनाक रोग है जो बहुधा आंख को नष्ट कर देता है। आंखों की कई बीमारियों में नीचे लिखे सरल उपाय करने हितकारी सिद्ध होंगे-
      • सौंफ़ नेत्रों के लिये हितकर है। मोतियाबिंद रोकने के लिये इसका पावडर बनालें। एक बडा चम्मच भर सुबह शाम पानी के साथ लेते रहें। नजर की कमजोरी वाले भी यह उपाय करें।
      • विटामिन ए नेत्रों के लिये अत्यंत फ़ायदेमंद होता है। इसे भोजन के माध्यम से ग्रहण करना उत्तम रहता है। गाजर में भरपूर बेटा केरोटिन पाया जाता है जो विटामिन ए का अच्छा स्रोत है। गाजर कच्ची खाएं और जिनके दांत न हों वे इसका रस पीयें। २०० मिलि.रस दिन में दो बार लेना हितकर माना गया है। इससे आंखों की रोशनी भी बढेगी। मोतियाबिंद वालों को गाजर का उपयोग अनुकूल परिणाम देता है।
      • आंखों की जलन,रक्तिमा और सूजन हो जाना नेत्र की अधिक प्रचलित व्याधि है। धनिया इसमें उपयोगी पाया गया है।सूखे धनिये के बीज १० ग्राम लेकर ३०० मिलि. पानी में उबालें। उतारकर ठंडा करें। फ़िर छानकर इससे आंखें धोएं। जलन,लाली,नेत्र शौथ में तुरंत असर मेहसूस होता है।
      • आंवला नेत्र की कई बीमारियों में लाभकारी माना गया है। ताजे आंवले का रस १० मिलि. ईतने ही शहद में मिलाकर रोज सुबह लेते रहने से आंखों की ज्योति में वृद्धि होती है। मोतियाबिंद रोकने के तत्व भी इस उपचार में मौजूद हैं।
      • भारतीय परिवारों में खाटी भाजी की सब्जी का चलन है। खाटी भाजी के पत्ते के रस की कुछ बूंदें आंख में सुबह शाम डालते रहने से कई नेत्र समस्याएं हल हो जाती हैं। मोतियाबिंद रोकने का भी यह एक बेहतरीन उपाय है।
      • अनुसंधान में साबित हुआ है कि कद्दू के फ़ूल का रस दिन में दो बार आंखों में लगाने से मोतियाबिंद में लाभ होता है। कम से कम दस मिनिट आंख में लगा रहने दें।
      • घरेलू चिकित्सा के जानकार विद्वानों का कहना है कि शहद आंखों में दो बार लगाने से मोतियाबिंद नियंत्रित होता है।
      • लहसुन की २-३ कुली रोज चबाकर खाना आंखों के लिये हितकर है। यह हमारे नेत्रों के लेंस को स्वच्छ करती है।
      • पालक का नियमित उपयोग करना मोतियाबिंद में लाभकारी पाया गया है। इसमें एंटीआक्सीडेंट तत्व होते हैं।
      • एक और सरल उपाय बताते हैं- अपनी दोनों हथेलियां आंखों पर ऐसे रखें कि ज्यादा दबाव मेहसूस न हो। हां, हल्का सा दवाब लगावे। दिन में चार-पांच बार और हर बार आधा मिनिट के लिये करें। मोतियाबिंद से लडाई का अच्छा तरीका है।
      • किशमिश ,अंजीर और खारक पानी में रात को भिगो दें और सुबह खाएं । मोतियाबिंद की अच्छी घरेलू दवा है।
      • भोजन के साथ सलाद ज्यादा मात्रा में शामिल करें । सलाद पर थोडा सा जेतून का तेल भी डालें।

      फायदेमन्द व्यायाम व योगासन

      • औषधियाँ प्रयोग करने के साथ-साथ रोज सुबह नियमित रूप से सूर्योदय से दो घंटे पहले नित्य क्रियाओं से निपटकर शीर्षासन और आंख का व्यायाम अवश्य करें।
      • आंख के व्यायाम के लिए पालथी मारकर पद्मासन में बैठें। सबसे पहले आंखों की पुतलियों को एक साथ दाएँ-बाएँ घुमा-घुमाकर देखें फिर ऊपर-नीचे देखें। इस प्रकार यह अभ्यास कम से कम 10-15 बार अवश्य करें। इसके बाद सिर को स्थिर रखते हुए दोनों आंखों की पुतलियों को एक गोलाई में पहले सीधे फिर उल्टे (पहले घड़ी की गति की दिशा में फिर विपरीत दिशा में) चारों ओर घुमाएँ। इस प्रकार कम से कम 10-15 बार करें। इसके बाद शीर्षासन करें।
      • मोतियाबिंद के रोगी को गेहूँ की ताजी रोटी खानी चाहिए। गाय का दूध बगैर चीनी का ही पीएँ। गाय के दूध से निकाला हुआ घी भी सेवन करें। आंवले के मौसम में आंवले के ताजा फलों का भी सेवन अवश्य करें। फलों में अंजीर व गूलर अवश्यक खाएं।
      • सुबह-शाम आंखों में ताजे पानी के छींटे अवश्य मारें। मोतियाबिंद के रोगी को कम या बहुत तेज रोशनी में नहीं पढ़ना चाहिए और रोशनी में इस प्रकार न बैठें कि रोशनी सीधी आंखों पर पड़े। पढ़ते-लिखते समय रोशनी बार्ईं ओर से आने दें।
      • जो लोग उच्च निकट दृष्टि दोष (मायोपिया) से प्रभावित होते हैं उनमें मोतियाबिंद का खतरा कहीं अधिक होता है। डॉक्टर के मुताबिक बचपन में देखन की क्षमता का विकास होता और किशोरावस्था में आंख की लंबाई बढ़ती है लेकिन निकट दृष्टि दोष होने की वजह से यह कुछ ज्यादा ही बढ़ जाती है। ऐसी स्थिति में आंख में जानेवाला प्रकाश रेटिना पर केंद्रित नहीं होता। इसी वजह से तस्वीर धुंधली दिखाई देती है लेकिन इस दोष को कॉंटैक्ट लेंस या सर्जरी से ठीक कराया जा सकता है।
      • किसी व्‍यक्ति को यह विकार यदि दोनों आंखों में हो गया है तो सर्जरी के जरिये आंखों में टेलीस्‍कोपिक लेंस प्रत्‍यारोपित किया जाता है। टेलीस्‍कोपिक लेंस एक छोटी सी प्‍लास्टिक ट्यूब की तरह दिखता है, सर्जरी के बाद यह आंखों की रोशनी बढ़ाता है। टेलीस्‍कोपिक लेंस प्रत्‍यारोपण के बाद यह दूर और नजदीक दोनों प्रकार के नेत्र विकारों में सुधार करता है।

      Sunday, March 19, 2017

      आंखों के नीचे काले घेरे ऐसे करें दूर,How to Remove Dark Circles in Hindi,

      आंखों के नीचे काले घेरे ऐसे करें दूर,How to Remove Dark Circles in Hindi,
      काले घेरे एक आम समस्या है जो बहुत लोगों को प्रभावित करती है। यह महिलाओं और पुरुषों दोनों को प्रभावित करता है लेकिन महिलाओं में यह ज्यादा देखा जाता है। आँखों के आसपास की त्वचा कहीं ज्यादा नाजुक होती है और चेहरे के अन्य भागों की अपेक्षा पतली भी, इसलिये इसे ज्यादा ध्यान देने की आवश्यकता है।  How to Remove Dark Circles
      जब आँखों के नीचे का रंग बदल जाता है और उसमे कालापन आ जाता है। तो इस आँखों का काला घेरा ( Dark Circle ) कहते है। यह समस्या विशेषकर लड़कियों और महिलाओं में ज्यादा होती है। मनुष्य का चेहरा हे उसके दिल और स्वास्थ्य के बारे में पूरी जानकारी दे देता है। जब कोई बीमार होता है या तनाव में होता है तो उसके आँखों के नीचे काले घेरे जैसे बन जाते है , जिसे हम डार्क सर्कल कहते हैं। 

      आंखों के नीचे कालापन का  कारण

      इसके पीछे कई कारण होते हैं

      • जैसे शरीर में पानी की कमी, तनाव, धूप और प्रदूषण में ज्यादा देर रहना, अनियमित दिनचर्या आदि। कई बार हम समझ नहीं पाते, लेकिन डार्क सर्कल्स की समस्या एलर्जी का भी नतीजा हो सकता है। यह एलर्जी किसी क्रीम, कॉस्मेटिक या दवाई से हो सकती है। ऐसे मामलों में तुरंत डॉक्टरी सलाह लेने में ही भलाई है, नहीं तो समस्या कोई और रूप ले सकती है। 
      • यह समस्या अनुवांशिक भी हो सकती है। इसके अलावा कुछ दवाओं के सेवन (मेडिकेशन) से, थकान से, यकृत (लीवर) की समस्या के कारण, एक्जिमा, अस्थमा आदि के कारण, रक्त की कमी (रक्तक्षीणता) के कारण या उम्र की अधिकता से भी हो सकती है।
      • कई बार बहुत अधिक तनाव लेने की वजह से आंखों के नीचे काले घेरे बन जाते हैं. इसके अलावा कम सोने, हार्मोन्स में परिवर्तन होने, अव्यवस्थित लाइफस्टाल होने या फिर हेरेडेट्री होने की वजह से भी आंखों के नीचे काले घेरे बन जाते हैं.
      • नींद पूरी  न होने से भी आँखों के नीचे काले घेरे हो जाते हैं। 
      • खान - पान सही न होना। 
      • बहुत ज्यादा थकान। 
      • सिगरेट , शराब का बहुत मात्रा में सेवन करना। 
      • हार्मोन का असंतुलन। 
      • कैल्शियम  और आयरन  की कमी। 

      आंखों के नीचे काले घेरे ऐसे करें दूर,How to Remove Dark Circles in Hindi,

      ऐसे में इन घरेलू नुस्खों को अपनाकर डार्क सर्कल्स को दूर किया जा सकता है:
      • 50 ग्राम तुलसी के पत्ते, नीम के पत्ते और पुदीने के पत्तों को गुलाबजल में मिक्स कर के पीस लें। इस रस में थोड़ा हल्दी पाउडर मिक्स कर के पेस्ट बना लें और इस पेस्ट को काले घेरों पर लगाएं, ऐसा करने से डार्क सर्कल की समस्या काफी हद तक कम हो जाएगी। 
      • संतरे या गाजर का रस संतरे या गाजर का रस निकालें और रूई को उसमें भिगो कर कुछ देर तक आंखों पर रखें। इससे डार्क सर्कल में काफी हद तक फायदा पहुंचेगा। रोगन बादाम से मसाज रात को सोने से पहले आधा चम्मच रोगन बादाम, तीन बूंद प्योर आरेंज आयल और दो बूंद शहद को मिक्स कर लें। इस मिश्रण को तर्जनी उंगली में लेकर आंखों के चारों ओर हल्के-हल्के से गोलाई में मालिश करें। इससे काफी लाभ मिलेगा। 
      • डार्क सर्कल दूर करने के लिए टमाटर सबसे कारगर उपाय है. ये नेचुरल तरीके से आंखों के नीचे के काले घेरे को खत्म करने का काम करताहै. साथ ही इसके इस्तेमाल से त्वचा भी कोमल और फ्रेश बनी रहती है. टमाटर के रस को नींबू की कुछ बूंदों के साथ मिलाकर लगाने से जल्दी फायदा होता है.
      • डार्क सर्कल दूर करने के लिए आलू का भी प्रयोग किया जा सकता है. आलू के रस को भी नींबू की कुछ बूंदों के साथ मिला लें. इस मिश्रण को रूई की सहायता से आंखों के नीचे लगाने से काले घेरे समाप्त हो जाएंगे .
      • ठंडे टी-बैग्स के इस्तेमाल से भी डार्क सर्कल जल्दी समाप्त हो जाते हैं. टी-बैग को कुछ देर पानी में डुबोकर रख दें. उसके बाद इसे फ्रिज में ठंडा होने के लिए रख दें. कुछ देर बाद इसे निकालकर आंखों पर रखकर लेट जाएं. 10 मिनट तक रोज ऐसा करने से फायदा होगा. 
      • ठंडे दूध के लेप से भी आंखों के नीचे का कालापन दूर हो जाता है. कच्चे दूध को ठंडा होने के लिए रख दें. उसके बाद कॉटन की मदद से उसे आंखों के नीचे लगाएं. ऐसे दिन में दो बार करने से जल्दी फायदा होगा.
      • संतरे के छिलके को धूप में सुखाकर पीस लें. इस पाउडर में थोड़ी सी मात्रा में गुलाब जल मिलाकर लगाने से काले घेरे खत्म हो जाएंगे. How to Remove Dark Circles
      • आँखों की गर्मी या आँख आने परः नींबू एवं गुलाबजल का समान मात्रा का मिश्रण एक-एक घण्टे के अंतर से आँखों में डालने से एवं हल्का-हल्का सेंक करते रहने से एक दिन में ही आयी हुई आँखें ठीक होती हैं

      Monday, February 20, 2017

      हाथ और पैरों के तलवों में जलन,Home Remedies For Burning Feet In Hindi,

      हाथ और पैरों के तलवों में जलन,Pairo-ke-Taluo-ki-Jalan-Dur-Karane-ke-Upay
      अक्सर कई लोगो को हाथो और पैरो में जलन होती हैं, वैसे तो ये समस्या गर्मियों में अधिक होती हैं, मगर कई बार कुछ बीमारियो के कारण ये सर्दियों में भी होती हैं। आज हम आपको बताएँगे इसके कारण और इसके सरल उपचार।

      पैरों में जलन के कारण ,Causes of Burning Legs 

      • तंत्रिका तंत्र में शिथिलता या कमजोरी 
      • मधुमेह
      • अधिक शराब का सेवन 
      • विषाक्त पदार्थों का सेवन 
      • विटामिन बी, कैल्शियम और फोलिक एसिड की कमी 
      • किडनी रोग
      • पैर सिंड्रोम
      • अधिक गर्म दवाओं का सेवन
      • रक्त प्रवाह का कम होना  

      हाथ और पैरों के तलवों में जलन,Pairo-ke-Taluo-ki-Jalan-Dur-Karane-ke-Upay

      • करेला : करेले के पत्तों का रस निकालकर पैरों के तलुवों पर इसकी मालिश करने से पैरों की जलन दूर हो जाती है। करेले के पत्तों को पीसकर पैरों पर लेप करने से भी इस रोग में लाभ होता है।
      • सरसो का तेल और लहसुन : सरसो के तेल में 3-4 लहसुन की कलियाँ काट कर तब तक गरम करे जब तक लहसुन की कलियाँ काली ना पड़ जाये। फिर उस तेल से हथेली और पैरो के तलवो में मालिस करने से जलन में आराम मिल जायेगा। सरसो के तेल में अनामिका ऊँगली को डुबो कर अपनी नाभि पर लेटकर गोल गोल तब तक घुमाए जब तक नाभि सारा तेल ना सोख ले। यह दोनों सबसे उत्तम तरीके है जलन से निजात पाने के।
      • लौकी : लौकी को काटकर इसके गूदे को पैरों के तलुवों पर लगाने से पैरो की गर्मी, जलन आदि दूर हो जाती है।
      • सरसों : हाथ-पैरों या पैरों के तलुवों में जलन होने पर सरसों का तेल लगाने से लाभ होता है। 2 गिलास गर्म पानी में 1 चम्मच सरसों का तेल मिलाकर रोजाना दोनों पैर इस पानी के अंदर रखें। 5 मिनट के बाद पैरो को किसी खुरदरी चीज से रगड़कर ठण्डे पानी से धोने से पैर साफ रहते हैं और पैरों की गर्मी दूर होती है।
      • मेहंदी : गर्मी के मौसम में जिन लोगों के पैरों में लगातार जलन होती रहती है उनकें पैरों में मेंहदी लगाने से उनकी जलन दूर हो जाती है।
      • आम : आम की बौर (फल लगने से पहले निकलने वाले फूल) को रगड़ने से हाथों और पैरों की जलन समाप्त हो जाती है।
      • धनिया : सूखे धनिये और मिश्री को बराबर मात्रा में लेकर पीस लें। फिर इसको 2 चम्मच की मात्रा में रोजाना 4 बार ठंडे पानी से लेने से हाथ और पैरों की जलन दूर हो जाती है।
      • मक्खन : मक्खन और मिश्री को बराबर मात्रा में मिलाकर लगाने से हाथ और पैरों की जलन दूर हो जाती है। 
      • कतीरा (कतीरा एक प्रकार का गोंद होता है) : 2 चम्मच कतीरा को रात को सोने से पहले 1 गिलास पानी में भिगों दें। सुबह कतीरा के फूल जाने इसको शक्कर के साथ मिलाकर रोजाना खाने से हाथों और पैरों की जलन दूर हो जाती है। वैसे तो यह हर मौसम में काम आता है लेकिन गर्मियों में बहुत ही लाभदायक होता है।
      • विटामिन : शरीर में विटामिन बी-1 की कमी के कारण भी पैरो के तलुओ में जलन होती हैं इसलिए भोजन में विटामिन बी-1 का इस्तेमाल करे। इसके लिए मटर, हरी सब्जिया, आलू, दूध, अंकुरित गेंहू, काजू इसके अच्छे स्त्रोत हैं।
      • ब्लड शुगर : अपनी ब्लड शुगर की भी जांच ज़रूर करवाये, कुछ रोगियों को ब्लड शुगर के कारण ऐसी समस्याओ का सामना करना पड़ता हैं।

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