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Monday, August 12, 2019

साईटिका का उपचार-Home Remedies for Sciatica in Hindi


How to Cure Sciatica


साईटिका में होने वाला दर्द, स्याटिक नर्व के कारण होता है। यह दर्द सामान्यत: पैर के निचले हिस्से की तरफ फैलता है। ऐसा दर्द स्याटिक नर्व में किसी प्रकार के दबाव, सूजन या क्षति के कारण उत्पन्न होता है। इसमें चलने-उठने-बैठने तक में बहुत तकलीफ होती है। यह दर्द अकसर लोगों में 30 से 50 वर्ष की उम्र में होता है

साईटिका रोग होने का कारण:-

  • जब किसी व्यक्ति की रीढ़ की हड्डी में चोट लग जाती है तो उसे यह रोग हो जाता है।
  • यदि साईटिका नाड़ी के पास विजातीय द्रव (दूषित द्रव) जमा हो जाता है तो नाड़ी दब जाती है जिसके कारण साईटिका रोग हो जाता है। 
  • रीढ़ की हड्डी के निचले भाग में आर्थराइटिस रोग हो जाने के कारण भी यह रोग हो सकता है।
  • असंतुलित भोजन का सेवन करने तथा गलत तरीके के खान-पान से भी यह रोग हो जाता है।
  • रात के समय में अधिक जागने के कारण भी यह रोग हो सकता है।
  • अधिक समय तक एक ही अवस्था में बैठने या खड़े रहने के कारण भी यह रोग हो सकता है।
  • अपनी कार्य करने की क्षमता से अधिक परिश्रम करने के कारण या अधिक सहवास करने के कारण भी यह रोग हो सकता है। 

साईटिका का लक्षण

कमर के निचले हिस्से मेँ दर्द के साथ जाँघ व टांग के पिछले हिस्से मेँ दर्द। पैरोँ मेँ सुन्नपन के साथ मांसपेशियोँ मेँ कमजोरी का अनुभव। पंजोँ मेँ सुन्नपन व झनझनाहट। पैदल चलने में परेशानी।
सर्जरी या वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति से हो सकती है। साईटिका नर्व (नाड़ी) शरीर की सबसे लंबी नर्व होती है। यह नर्व कमर की हड्डी से गुजरकर जांघ के पिछले भाग से होती हुई पैरोँ के पिछले हिस्से मेँ जाती है। जब दर्द इसके रास्ते से होकर गुजरता है, तब ही यह साईटिका का दर्द कहलाता है।

साईटिका का उपचार-Best Treatment for Sciatica at home,How to Cure Sciatica

  • आलू का रस 300 ग्राम नित्य २ माह तक पीने से साईटिका रोग नियंत्रित होता है। इस उपचार का प्रभाव बढाने के लिये आलू के रस मे गाजर का रस भी मिश्रित करना चाहिये।
  • लहसुन की खीर इस रोग के निवारण में महत्वपूर्ण है। 100 ग्राम दूध में 4-5 लहसुन की कली चाकू से बारीक काटकर डालें। इसे उबालकर ठंडी करके पीलें। यह विधान 2-3 माह तक जारी रखने से साईटिका रोग को उखाड फ़ैंकने में भरपूर मदद मिलती है। 
  • लहसुन में एन्टी ओक्सीडेन्ट तत्व होते हैं जो शरीर को स्वस्थ रखने हेतु मददगार होते है । हरे पत्तेदार सब्जियों का भरपूर उपयोग करना चाहिये। कच्चे लहसुन का उपयोग साईटिका रोग में अत्यंत गुणकारी है। सुबह शाम 2-3 लहसुन की कली पानी के साथ निगलने से भी फायदा होता है। हरी मटर, पालक, कलौंजी, केला, सूखे मेवे ज्यादा इस्तेमाल करें। 
  • साईटिका रोग को ठीक करने में नींबू का अपना महत्व है। रोजाना नींबू के रस में दो चम्मच शहद मिलाकर पीने से आशातीत लाभ होता है। 
  • सरसों के तेल में लहसुन पकालें। दर्द की जगह इस तेल की मालिश करने से तुरंत आराम लग जाता है।
  • लौह भस्म 20 ग्राम+विष्तिंदुक वटी 10 ग्राम+रस सिंदूर 20 ग्राम+त्रिकटु चूर्ण 20 ग्राम इन सबको अदरक के रस के साथ घोंटकर 250 गोलियां बनालें। दो-दो गोली पानी के साथ दिन में तीन बार लेते रहने से साईटिका रोग जड़ से समाप्त हो जाता है। 
  • प्रतिदिन सामान्य व्यायाम करेँ। वजन नियंत्रण मेँ रखेँ। पौष्टिक आहार ग्रहण करेँ। रीढ़ की हड्डी को चलने-फिरने और उठते-बैठते समय सीधा रखेँ। भारी वजन न उठाएं।
  •  रोगी को प्रतिदिन अपने पैरों पर सरसों के तेल से नीचे से ऊपर की ओर मालिश करनी चाहिए। इससे यह रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है। 
  • 5 कालीमिर्चों को तवे पर सेंककर कर सुबह के समय में खाली पेट मक्खन के साथ सेवन करना चाहिए। इस प्रयोग को प्रतिदिन करने से यह रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।
  • करेला, लौकी, टिण्डे, पालक, बथुआ तथा हरी मेथी का अधिक सेवन करने से साईटिका रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है। 
  • इस रोग से पीड़ित रोगी को पपीते तथा अंगूर का अधिक सेवन करना चाहिए। इससे यह रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।
  • सूखे मेवों में किशमिश, अखरोट, अंजीर, मुनक्का का सेवन करने से भी यह रोग कुछ दिनों में ठीक हो जाता है। 
  • फलों का रस दिन में 3 बार तथा आंवला का रस शहद के साथ मिलाकर पीने से साईटिका रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है। 
  • इस रोग को ठीक करने के लिए रोगी व्यक्ति को सबसे पहले एनिमा क्रिया करके अपने पेट को साफ करना चाहिए। इसके बाद रोगी को अपने पैरों पर मिट्टी की पट्टी का लेप करना चाहिए। इसके बाद रोगी को कटिस्नान करना चाहिए और फिर इसके बाद मेहनस्नान करना चाहिए। इसके बाद कुछ समय के लिए पैरों पर गर्म सिंकाई करनी चाहिए और गर्म पाद स्नान करना चाहिए। इस प्रकार से उपचार करने से साईटिका रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है। 
  • सुबह के समय में सूर्यस्नान करने तथा इसके बाद पैरों पर तेल से मालिश करने और कुछ समय के बाद रीढ़ स्नान करने तथा शरीर पर गीली चादर लपेटने से साईटिका रोग ठीक हो जाता है।
    सूर्यतप्त लाल रंग की बोतल के तेल की मालिश करने से तथा नारंगी रंग की बोतल का पानी कुछ दिनों तक पीने से साईटिका रोग ठीक हो जाता है। 
  • तुलसी के पत्तों को पीसकर पानी में मिलाकर प्रतिदिन सेवन करने से यह रोग ठीक हो जाता है।
    हार-सिंगार के पत्तों का काढ़ा सुबह के समय में प्रतिदिन खाली पेट पीने से साईटिका रोग ठीक हो जाता है 

Monday, July 15, 2019

फाइलेरिया के कारण लक्षण और उसके घरेलू उपाय,What is Filaria in Hindi,

फाईलेरिया रोग का इलाज संभव है। अगर इसका इलाज प्रारंम्भिक अवस्था में हो जाय तो संक्रमण को फैलने से रोका जा सकता है। फाइलेरिया रोग में अकसर हाथ या पैर बहुत ही ज़्यादा सूज जाते हैं। इसलिए इस रोग को हाथी पांव भी कहते हैं। पर फाइलेरिया रोग से पीड़ित हर व्यक्ति के हाथ या पैर नहीं सूजते। यह बीमारी पूर्वी भारत, मालाबार और महाराष्ट्र के पूर्वी इलाकों में बहुत अधिक फैली हुई है।
  • यह कृमिवाली बीमारी है। यह कृमि लसिका तंत्र की नलियों में होते हैं और उन्हें बंद कर देते हैं। क्यूलैक्स मच्छर के काटने से बहुत छोटे आकार के कृमि शरीर में प्रवेश करते हैं। मलेरिया के कीड़ों की तरह यह कीड़े मनुष्यों और मच्छरों दोनों में छूत पैदा करते हैं फाइलेरिया (Lymphatic Filariasis) एक परजीवीजन्य संक्रामक बीमारी है जो धागे जैसे कृमियों से होती है। वैश्विक स्तर पर इसे एक उपेक्षित उष्णकटिबंधीय बीमारी (Neglected Tropical Disease) माना जाता है। 
  • फाइलेरिया दुनिया भर के उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय देशों में एक गंभीर स्वास्थ्य समस्या है। जिसमें भारत भी शामिल है। विश्व में लगभग 1.3 अरब लोगों को इस बीमारी के संक्रमण का खतरा है और लगभग 12 करोड़ लोग इससे वर्तमान में संक्रमित हो चुके हैं, जिनमें से लगभग 4 करोड़ लोग इस बीमारी की वजह से किसी विकृति का शिकार हो गए हैं या अक्षम हो चुके हैं।
  • फाइलेरिया 2.5 करोड़ से ज्यादा पुरुषों को जननांग के विकार और 1.5 करोड़ से ज्यादा लोगों को सूजन से प्रभावित कर चुका है। हाथीपांव (Elephantiasis) फाइलेरिया का सबसे सामान्य लक्षण है जिसमें शोफ (Oedema) के साथ चमड़ी तथा उसके नीचे के ऊतक मोटे हो जाते हैं।

क्या हैं फाइलेरिया के लक्षण,filaria symptoms

इस तथ्य का अभी तक सटीक आकलन नहीं किया जा सका है कि संक्रमण के बाद फाइलेरिया के लक्षण प्रकट होने में कितना समय लगता है। हालांकि मच्छर के काटने के 16-18 महीनों के पश्चात बीमारी के लक्षण प्रकट होते हैं। फाइलेरिया के ज्यादातार लक्षण और संकेत वयस्क कृमि के लसीका तंत्र में प्रवेश के कारण पैदा होते हैं
  • कृमि द्वारा ऊतकों को नुकसान पहुंचाने से लसीका द्रव का बहाव बाधित होता है जिससे सूजन, घाव और संक्रमण पैदा होते हैं। पैर और पेड़ू सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले अंग हैं। फाइलेरिया का संक्रमण सामान्य शारीरिक कमजोरी, सिरदर्द, मिचली, हल्के बुखार और बार-बार खुजली के रूप में प्रकट होता है।
  • फाइलेरिया कभी-कभार ही जानलेवा साबित होता है, हालांकि इससे बार-बार संक्रमण, बुखार, लसीका तंत्र में गंभीर सूजन और फेफड़ों की बीमारी ‘ट्रॉपिकल पल्मोनरी इओसिनोफीलिया (Tropical Pulmonary Eosinophilia) हो जाती है। ट्रॉपिकल पल्मोनरी इओसिनोफीलिया के लक्षणों में खांसी, सांस लेने में परेशानी और सांस लेने में घरघराहट की आवाज होती है। लगभग 5 प्रतिशत मामलों में पैरों में सूजन आ जाती है जिसे फ़ीलपांव अथवा हाथीपांव कहते हैं। फाइलेरिया से गंभीर विकृति, चलने-फिरने में परेशानी और लंबी अवधि की विकलांगता हो सकती है।
  • फाइलेरिया के कारण हाइड्रोसील (Hydrocoele) भी हो सकता है। मरीज के वृषणकोष (Scrotum) में सूजन भी आ सकती है जिसे ‘फाइलेरियल स्क्रोटम’ (Filarial scrotum) कहा जाता है। कुछ मरीजों में मूत्र का रंग दूधिया हो जाता है। महिलाओं में वक्ष या बाह्य जननांग भी प्रभावित होते हैं। कुछ मामलों में पेरिकार्डियल स्पेस (हृदय और उसके झिल्लीदार आवरण के बीच की जगह) में भी द्रव जमा हो जाता है।

फाइलेरिया के कौन से कारक जीव

फाइलेरिया, फाइलेरियोडिडिया (Filariodidea) कुल के नेमैटोडों (गोलकृमि) के संक्रमण से होता है। तीन प्रकार के कृमि इस बीमारी को जन्म देते हैं। ये हैं वुचिरेरिया बैंक्राफ्टाई (Wuchereria bancrofti), ब्रुजिया मलाई (Brugia malayi) औरब्रुजिया टिमोरीई (Brugia timori)। वुचिरेरिया बैंक्राफ्टाई इस बीमारी का सबसे सामान्य कारक है जो पूरे विश्व में पाया जाता है।
  • ब्रुजिया मलाई दक्षिण-पश्चिम भारत, चीन, इंडोनेशिया, मलेशिया, दक्षिण कोरिया, फिलिपींस और वियतनाम में पाया जाता है जबकि ब्रुजिया टिमोराई सिर्फ इंडोनेशिया तक ही सीमित है। 
  • वुचिरेरिया बैंक्राफ्टाई में नर कृमि 40 मिलीमीटर लंबा होता है जबकि मादा की लंबाई लगभग 50-100 मिलीमीटर होती है।
  • फाइलेरिया भारत में एक प्रमुख स्वास्थ्य समस्या है। यह संक्रामक बीमारी देश के राज्यों उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, तमिलनाडु, गुजरात, केरल एवं केन्द्र शासित प्रदेशों लक्षद्वीप और अंडमान निकोबार में स्थाई रूप से उभरती रहती है। 
  • भारत में मुख्य तौर पर फाइलेरिया के दो प्रकार के संक्रमण होते हैं, एक वुचिरेरिया बैंक्राफ्टाई से और दूसरा ब्रुजिया मलाई से। वुचिरेरिया बैंक्राफ्टाई के संक्रमण से होने वाला बैंक्रोफ्टियन फाइलेरिया (Bancroftian filaria) भारत में फाइलेरिया के कुल मामलों का लगभग 98 प्रतिशत होता है

कैसे फैलता है फाइलेरिया

  • फाइलेरिया मच्छरों से फैलता है जो परजीवी कृमियों के लिए रोगवाहक का काम करते हैं। 
  • इस परजीवी के लिए मनुष्य मुख्य पोषक है जबकि मच्छर इसके वाहक और मध्यस्थ पोषक हैं। 
  • कृमि प्रभावित क्षेत्रों से लोगों का रोजगार की तलाश में बाहर जाना, शहरीकरण, औद्योगिकीकरण, अज्ञानता, आवासीय सुविधाओं की कमी और स्वच्छता की अपर्याप्त स्थिति से यह संक्रमण फैलता है। 
  • संक्रमण के बाद कृमि के लार्वा संक्रमित व्यक्ति की रक्तधारा में बहते रहते हैं जबकि वयस्क कृमि मानव लसीका तंत्र में जगह बना लेता है। एक वयस्क कृमि की आयु सात वर्ष तक हो सकती है।
  •  संक्रमित मच्‍छर के काटने से इसके कीड़े फैलते है। जब मनुष्‍य बच्‍चा होता है तो आम तौर पर संक्रमण आरंभ हो जाता है। तीन प्रकार के कीड़े होते है जिनके कारण बीमारी फैलती है: Wuchereria bancrofti, Brugia malayi, और Brugia timori. Wuchereria bancrofti यह सबसे सामान्‍य है। यह कीड़ा lymphatic system को नुकसान पहुंचाता है।
  •  रात के समय एकत्रित किए गए खून को, एक प्रकार के सूक्ष्‍मदर्शी के द्वारा देखने पर इस बीमारी का पता चलता है। खून को thick smear के रूप में और Giemsa के साथ दाग के रूप में होना चाहिए।. बीमारी के विरूद्ध एंटीबाडियों हेतु खून की जांच भी की जा सकती है।
  • यह शोथ न्यूनाधिक होता रहता है, परंतु जब ये कृमि अंदर ही अंदर मर जाते हैं, तब लसीकावाहिनियों का मार्ग सदा के लिए बंद हो जाता है और उस स्थान की त्वचा मोटी तथा कड़ी हो जाती है। लसीका वाहिनियों के मार्ग बंद हो जाने से यदि अंग फूल जाएँ, तो कोई भी औषध ऐसी नहीं है जो अवरुद्ध लसीकामार्ग को खोल सके। 
  • कभी कभी किसी किसी रोगी में शल्यकर्म द्वारा लसीकावाहिनी का नया मार्ग बनाया जा सकता है। इस रोग के समस्त लक्षण फाइलेरिया के उग्र प्रकोप के समान होते हैं।

फाइलेरिया का घरेलू इलाज

इलाज बीमारी की शुरुआती अवस्था में ही शुरु हो जाना चाहिए। याद रखना चाहिए कि हाथों या पैरों की सूजन ठीक करने के लिए हमारे पास कोई भी दवाई नहीं है। डाईइथाइल – कार्बामाज़ीन (DEC) फाइलेरिया की एक दवा है। इसे दो हफ्तों दिया जाना चाहिए। इस दवा से सिर में दर्द, मितली, उल्टी जैसी प्रतिक्रियाएं हो सकती हैं। कभी कभी इससे एलर्जी भी हो जाती है। आप इसके बारे में और अधिक दवाइयों वाले अध्याय में पढ़ सकते हैं।

फाइलेरिया पर नियंत्रण या रोकथाम phayaleriya-check फायलेरिया जॉंच के लिये खून का नमूना रात में लेना पडता है इस बीमारी कृमि के कई एक वाहक इलाज के लिए नहीं पहुँचते। इसलिए संक्रमणग्रस्त इलाकों में सभी की जांच ज़रूरी है। ऐसा न होने पर बीमारी फैलती जाती है। जिन क्षेत्रों में फाइलेरिया की समस्या हो वहॉं खास सर्वे किए जाने ज़रूरी होते हैं। फाइलेरिया के नियंत्रण के लिए रात को खून के आलेप के नमूने इकट्ठे करना, रोकथाम के लिये दवा प्रयोग और बीएचसी छिडकाकर मच्छरों पर नियंत्रण करना जैसे कदम उठाना ज़रूरी है। जिन क्षेत्रों में फाइलेरिया की बीमारी ज़्यादा होती है वहॉं नमक में DEC दवा मिलाना ठीक रहता है। इससे यह सुनिश्चित हो जाता है कि हर व्यक्ति को यह दवा मिल जाए (कम मात्रा में) और इससे सूक्ष्म फाइलेरिया कृमि को मारा जा सकता है।

ये सूक्ष्म फाइलेरिया कृमि खून में घूमते रहते हैं। ऐसा खासकर रात को होता है। क्यूलैक्स मच्छर जब खून चूसता है तो वो इन सूक्ष्म फाइलेरिया को अपने अंदर ले लेता है। और संक्रमण पैदा करने वाले लार्वा के रुप में इनका विकास 10 से 15 दिनों के अंदर होता है। इस अवस्था में मच्छर बीमारी पैदा करने वाला होता है। इस तरह यह चक्र चलता रहता है।

Thursday, January 11, 2018

दांत के दर्द का प्राकृतिक उपचार, Home Remedies for Teeth Pain in Hindi,



प्राकृतिक उपचार दंत पीडा में लाभकारी होते हैं। सदियों से हमारे बडे-बूढे दांत के दर्द में घरेलू पदार्थों का उपयोग करते आये हैं। यहां हम ऐसे ही प्राकृतिक उपचारों की चर्चा कर रहे हैं। असल में दांतों से जुड़ी हर समस्या के पीछे हमारी गलत खानपान और रहन-सहन की आधुनिक जीवन शैली है। चाय-कॉफी जैसे बेहद गर्म पेय तथा कोलड्रिक्स दोनों ही दांतों की जड़ों को कमजोर और खोखला कर देते हैं। सात्विक, ताजा तथा प्राकृतिक खानपान और सफाई के प्रति जागरूकता ही हमें दातों की समस्या से स्थाई छुटकार दिला सके। 
दांतों में दर्द होना बहुत ही आम बात है, लेकिन यह दर्द असहनीय होता है। हम दांतों की बहुत सारी तकलीफों से बच सकते अगर हम उनका धयान रखें। दांतों के दर्द से निवारण के लिए आप नीचे दिए गए Gharelu Nuskhe अपना सकते हैं।

 दांत के दर्द का प्राकृतिक उपचार, Home Remedies for Teeth Pain in Hindi,

    • कच्चा प्याज दांत के दर्द के लिए सबसे प्रभावशाली Gharelu Upchar है। एक ताज़ा प्याज काट कर दांतों पर 3 मिनट के लिए रगड़े। इससे दांतों के दर्द में आराम मिलेगा।
    • हींग दांतों के दर्द के लिए बहुत लाभदायक Gharelu Nuskhe में से एक है। जब भी दांत में दर्द हो तो हींग को मौसमी के रस में मिलाये और फिर रुई में लेकर उस रुई को दर्द करने वाले दांत पर रख दीजिये, इससे आपको दर्द से तुरंत निजात मिलेगी।
    • मसूड़े पर काली मिर्च के पाउडर को रगड़े, इससे मसूड़े सुन्न हो जायेंगे और दर्द काम हो जायेगा। यह gharelu upchar दांतों के लिए बहुत लाभदायक है।
    • बर्फ के टुकड़े से मसूड़े की सिकाई करें।
    • 5gm लौंग, 3gm कपूर को बारीक पीस कर दत्तो पर मलने से आराम मिलेगा। लौंग का तेल दांतों में लाएं, लेकिन धयान रहे की तेल मसूड़ों पर न लगे क्योंकि मसूड़े पर लगाने से उन पर जलन होती है।
    • लहसुन की एक लौंग चबाना भी दांतों के दर्द के लिए बहुत प्रभावी है।जिस दांत में दर्द हो उसके पास एक लौंग रखें। इससे दांत के दर्द में आराम आएगा।जिस दांत में दर्द हो, Vicks को अपने चेहरे के उस भाग पर लगाएं और किसी रुमाल से धक लें। Vicks की ऊष्मा से आपका दांतों का दर्द खत्म हो जायेगा 
    • टमाटर का सेवन करें, इससे दांत स्वस्थ और साफ़ रहते हैं। दांतों के दर्द में नमकीन पानी से गरारे करना बहुत लाभदायक है। हल्दी और सरसों के तेल को मिला कर दांतों का मंजन करें। दांत में दर्द होने पर, मीठा न खाए क्योंकि मीठा खाने से बैक्टीरिया और जर्म्स और भी ज्यादा बढ़ते है।
    • कैल्शियम और प्रोटीन युक्त खाने का सेवन करें। ताज़े आम के पत्तों को चबाएं और थूक दें।
    • दो ग्राम हींग नींबू के रस में पीसकर पेस्ट जैसा बनाले। इस पेस्ट से दंत मंजन करते रहने से दंतशूल का निवारण होता है।१२। मेरा अनुभव है कि विटामिन सी ५०० एम.जी. दिन में दो बार और केल्सियम ५००एम.जी दिन में एक बार लेते रहने से दांत के कई रोग नियंत्रित होंगे और दांत भी मजबूत बनेंगे।
    • मुख्य बात ये है कि सुबह-शाम दांतों की स्वच्छता करते रहें। दांतों के बीच की जगह में अन्न कण फ़ंसे रह जाते हैं और उनमें जीवाणु पैदा होकर दंत विकार उत्पन्न करते हैं।
    • शकर का उपयोग हानिकारक है। इससे दांतो में जीवाणु पैदा होते हैं। मीठी वस्तुएं हानिकारक हैं। लेकिन कडवे,ख्ट्टे,कसेले स्वाद के पदार्थ दांतों के लिये हितकर होते है। नींबू,आंवला,टमाटर ,नारंगी का नियमित उपयोग लाभकारी है। इन फ़लों मे जीवाणुनाशक तत्व होते हैं। मसूढों से अत्यधिक मात्रा में खून जाता हो तो नींबू का ताजा रस पीना लाभकारी है। हरी सब्जियां,रसदार फ़ल भोजन में प्रचुरता से शामिल करें।
    • दांतों की केविटी में दंत चिकित्सक केमिकल मसाला भरकर इलाज करते हैं। सभी प्रकार के जतन करने पर भी दांत की पीडा शांत न हो तो दांत उखडवाना ही आखिरी उपाय है।
     दांतों में पस मुख्य रूप से मसूड़ों में जलन और टूटे हुए दांत के कारण होता है। दांतों में पस मुख्य रूप से एक प्रकार का संक्रमण होता है जो मसूड़ों और दांतों की जड़ों के बीच होता है तथा इसके कारण बहुत अधिक दर्द होता है। इसके कारण दांत के अंदर पस बन जाता है जिसके कारण दांत में दर्द होता है।

    जिस दांत में पस हो जाता है उसमें बैक्टीरिया प्रवेश कर जाता है और वही बढ़ता रहता है जिससे उन हड्डियों में संक्रमण हो जाता है जो दांतों को सहारा देती हैं। यदि समय पर इसका उपचार नहीं किया गया तो इसके कारण जीवन को खतरा हो सकता है।

      Thursday, November 09, 2017

      पैर के मोच को कैसे ठीक करे,Home Remedies for a Sprained Ankle in Hindi,

      पैरों में मोच या फिर खिंचाव आने पर काफी सूजन और दर्द पैदा हो जाता है। यह कभी भी हो सकता है, चाहे आप खेल-कूद में लीन हो या फिर चलते चलते पैर मुड़ जाए। कई बार काम करते समय, खेलते कूदते सीढ़ी चढ़ते हमें यह मालूम ही नहीं हो पाता कि हमारे हाथ-पाँव या कमर में मोच लग गई है, लेकिन कुछ समय बाद उस जगह दुःखने पर हमें यह पता लगता है। मोच आने पर उस अंग पर सूजन आ जाती है और काफी दर्द होने लगता है , अगर आपको असहनीय दर्द या ज्यादा परेशानी है तो आप तुरंत डॉक्टर को दिखाएँ ,लेकिन यदि मोच छोटी है तो आप उस का घरेलू उपचार भी कर सकते है ।

      मोच, चोट और सूजन के कारण

      • मोच व चोट लगने का सबसे पहला कारण हमारी असावधानी हो सकती हैं. जैसे कई बार हम इतनी जल्दबाजी में होते हैं की हम सडक को पार करते हुए ध्यान ही नहीं देते और किसी दुर्घटना का शिकार हो जाते हैं
      • अधिक शारीरिक व्यायाम करने के कारण भी कई बार हमारे शरीर में मोच या अंदरूनी चोट लग जाती हैं. जिसका पता हमें व्यायाम करते समय नहीं चलता क्यूंकि व्यायाम करने से हमारे शरीर गरम हो जाता हैं.
      • बच्चों को अधिक चोट या मोच खेलते समय लगती हैं. 
      • अधिक तेजी से वाहन चलाने की वजह से भी कई बार लोगों को  चोट लग जाती हैं.

      मोच, चोट और सूजन के लक्षण

      • चोट या मोच लगने पर जिस भाग में चोट लगी हैं. वहां पर सूजन आ जाना.
      • चोट एवं मोच वाले स्थान में दर्द होना. 
      • चोट या मोच आने पर जिस भाग में चोट लगी हैं उसके आस – पास जलन होना.
      • चोट व मोच से प्रभावित त्वचा का लाला हो जाना.
      • अधिक चोट लगने पर खून बहना.
      • मोच आने पर त्वचा का रंग नीला हो जाना

      मोच, चोट और सूजन के लिए घरेलू उपाय,पैर के मोच को कैसे ठीक करे,Home Remedies for a Sprained Ankle in Hindi,

      • आक के पत्तों को गरम करके बाँधने से चोट अच्छी हो जाती है। सूजन दूर हो जाती है।
      • चोट के कारण कटे हुए स्थान पर पिसी हुई हल्दी भर देने से खून का बहना बंद हो जाता है तथा हल्दी कीटाणुनाशक भी होती है।
      • चोट व मोच के दर्द से राहत पाने के लिए तुलसी के पत्तों का उपयोग करना बहुत ही उपयोगी होता हैं. चोट व मोच को ठीक करने के लिए तुलसी के पत्ते लें और उसे पीस लें. अब इन पत्तियों के लेप को अपनी चोट व मोच पर लगा लें. इस लेप का प्रयोग करने से घाव जल्दी ही ठीक हो जाएगा तथा मोच भी ठीक हो जाएगी.
      • 2 कली लहसुन, 10 ग्राम शहद, 1 ग्राम लाख एवं 2 ग्राम मिश्री इन सबको चटनी जैसा पीसकर, घी डालकर देने से टूटी हुई अथवा उतरी हुई हड्डी जल्दी जुड़ जाती है।
      • लकड़ी-पत्थर आदि लगने से आयी सूजन पर हल्दी एवं खाने का चूना एक साथ पीसकर गर्म लेप करने से अथवा इमली के पत्तों को उबालकर बाँधने से सूजन उतर जाती है।
      • यदि आप के पैर में मोच आ गई है तो आप तेजपात को पीसकर मोच वाले स्थान पर लगायें ।
      • मोच अथवा चोट के कारण खून जम जाने एवं गाँठ पड़ जाने पर बड़ के कोमल पत्तों पर शहद लगाकर बाँधने से लाभ होता है।
      • अगर आपके पैर या हाथ में मोच आ गई है तो बिना देर किए थोडा सा बर्फ एक कपड़े में रखकर सूजन वाले जगह पर लगायें इससे सूजन कम हो जाता है। बर्फ लगाने से सूजन वाले जगह पर रक्त का संचालन अच्छी तरह से होने लगता है जिससे दर्द धीरे-धीरे कम होने लगता है।
      • हल्दी और सरसों के तेल को मिला लें और इसे हल्की आंच में गर्म करके फिर इसे मोच वाली जगह पर लगाएं और किसी कपड़े से इसे ढक दें।
      • अरनी के उबाले हुए पत्तों को किसी भी प्रकार की सूजन पर बाँधने से तथा 1 ग्राम हाथ की पीसी हुई हल्दी को सुबह पानी के साथ लेने से सूजन दूर होती
      • पका हुआ लहसुन और अजवायन को सरसों के तेल में मिलाकर गर्म करें। और फिर इस तेल की मालिश मोच वाले हिस्से पर करें। आपको राहत मिलेगी।
      • महुआ और तिल को कपड़े में बांध कर लगाने से हड्डी की मोच ठीक हो सकती है।
      • 1 से 3 ग्राम हल्दी और शक्कर फाँकने और नारियल का पानी पीने से तथा खाने का चूना एवं पुराना गुड़ पीसकर एकरस करके लगाने से भीतरी चोट में तुरंत लाभ होता है|
      • एलोवेरा के गूदे को सूजन और मोच वाली जगह पर लगाने से आराम मिलता है।
      • इमली की पत्तियों को पीसें और इसे आग में थोड़ा गुनगुना करें। और इसे मोच वाली जगह पर लगाने से दर्द से तुरंत राहत मिलती है।
      • ढ़ाक के गोंद को पानी में मिलाकर उसका लेप करने से चोट में सूजन सही हो जाती है ।
      • मोच को ठीक करने का एक और कारगर उपाय यह है कि आप अनार के पत्ते पीसकर मोच वाली जगह पर मलें।
      • चोट किसी भी स्थान पर लगी हो तो आप कपूर और घी की बराबर मात्रा में मिलाकर चोट वाले स्थान पर कपडे से बांधे एैसा करने से चोट का दर्द कम हो जाता है तथा रक्त बहना भी बंद हो जाता है।
      • सरसों के तेल में नमक को मिला लें और इसे गर्म करके मोच वाली जगह पर लगाएं। एैसा करने मोच में राहत मिलती है।
      • हाथ पैरों की ऐठन और पैर की मोच पर अखरोट का तेल लगाने से दर्द से राहत मिलती है।
      • चूने को शहद के साथ मिला लें और इससे मोच वाली जगह पर आराम से मालिश करें। इस उपाय से भी मोच में बहुत राहत मिलती है।
      • मोच को ठीक करने के लिए सरसों के तेल का प्रयोग करना बहुत ही लाभकारी सिद्ध होता हैं. मोच से जल्दी राहत पाने के लिए सरसों के तेल को मोच वाले स्थान पर लगा लें और इस पर हल्दी का पाउडर छिडक लें. हल्दी को छिडकने के बाद मोच को तौलिए से ढक दें. अब एक पोटली लें और उसमे नमक डाल लें और इसे बांध लें. अब इस पोटली को तवे पर गर्म करके तौलिए के उपर से गर्माहट सहन करने लायक सिकाई कर लें. आपकी मोच ठीक हो जाएगी.

      Sunday, October 08, 2017

      रेबीज का उपचार,Rabies Treatment in Hindi,

      रेबीज का उपचार,Rabies Treatment in Hindi,

      रेबीज का उपचार,Rabies Treatment in Hindi,

      रेबीज नामक रोग प्राचीन रोगों में से एक है। एक बार इस रोग के लक्षण उत्पन्न हो जाएं तो मृत्यु होने की संभावना बड़ जाती है। इस बीमारी के बारे में लोगों को ज्यादा जानकारी नहीं होती। 

      विश्व रेबीज दिवस की शुरुआत इंग्लैण्ड की एक संस्था ग्लोबल अलायंस फॉर रेबीज कंट्रोल द्वारा वर्ष 2007 में की गई थी। तभी से हर वर्ष रेबीज़ के टीके के जन्मदाता लुईस पाश्चर के निधन दिवस 28 सितंबर के ही दिन इसे मनाया जाता है।

      रेबीज एक विषाणुओं द्वारा होने वाला संक्रमक रोग है। इसका यह विषाणु ज्यादातर जानवरों जैसे कुत्ते, बिल्ली, चूहे अन्य आदि में पाया जाता है। इस रोग के विषाणु 0.0008 मि.मी लंबे और 0.00007 मि.ली व्यास वाले होत है। जानवरों द्वारा यह रोग इंसानों में फैलता है।

      रेबीज को हाइड्रोफोबिया भी कहा जाता है। यह पशुओं से फैलने वाला वायरल जूनोटिक इन्फेक्शन है। इससे इनकेफोलाइटिस जैसा उपद्रव होता है, जो निश्चित रूप से चिकित्सा न किए जाने पर घातक होता है। इसका प्रमुख कारण किसी पागल कुत्ते का काटना होता है।

      रोग के प्रारंभिक लक्षण 

      • सिर दर्द, बुखार, मितली आना, भूख न लगना, असहाय पीड़ा और प्रभावित क्षेत्र में जलन आदि। 
      • इसी के साथ व्यक्ति में तनाव, भय और उत्तेजना की वृद्धि होती है। 
      • मांसपेशियों में जकड़न, पीया पानी बाहर आना। 
      • इसलिए इस रोग का नाम जल आतंक अर्थात् हाइड्रोफोबिया रखा गया है। 
      • इसलिए व्यक्ति को ऐसे लक्षण दिखने पर तुरंत डॉक्टर के पास जाना चाहिए क्योंकि इसके चलते मौत भी हो सकती है। 

      रेबीज का इलाज - क्या करें काटने के बाद

      कुत्ते के काटने के बाद उस हिस्से को सबसे पहले पानी से खूब अच्छी तरह धोएं। फिर साबुन लगा कर धोएं। वहां पट्टी कतई न बांधें। पहला ऐंटि-रेबीज इंजेक्शन 24 घंटे के भीतर जरूर लगवा लें। 
      • कुत्ते, बिल्ली या बंदर के काटने को हल्के में लेना बड़ी भूल है। इससे जानलेवा रेबीज हो सकता है।
      • कुत्ते के काटने के बाद अब भी कई लोगों को यह लगता है कि पेट में 14 इंजेक्शन लगेंगे। यह गलत है। वैक्सिनेशन के तरीके और टाइम पीरियड अब बदल चुके हैं। यह भी जान लेना जरूरी है कि कुत्ते, बिल्ली या बंदर के काटने पर आपके काम का डॉक्टर जनरल फिजिशन (फैमिली डॉक्टर) ही है।
      • रेबीज को रोकने के लिए प्रॉपर वैक्सिनेशन (ऐंटि-रेबीज वैक्सिनेशन) की जाती है।
      • ऐंटि-रेबीज वैक्सीन सेंट्रल नर्वस सिस्टम (जहां रेबीज के वायरस अटैक करते हैं) पर रक्षात्मक परत बना कर उस वायरस के असर को खत्म कर देती है।
      • वैक्सिनेशन दो तरह से की जाती है: ऐक्टिव और पैसिव।अगर जख्म गहरा हो तो ऐक्टिव वैक्सिनेशन के तहतदो इंजेक्शन फौरन लगते हैं। इसमें ऐंटि-रेबीज सीरम कोपहले मसल्स (बाजू या हिप्स) में और फिर ठीक उस जगह पर जहां कुत्ते, बिल्ली या बंदर ने काटा हो, इंजेक्शन के जरिए डाला जाता है।
      • इसके बाद बारी आती है पैसिव वैक्सिनेशन की। इसमें पांच इंजेक्शन एक खास टाइम पीरियड में लेने पड़ते हैं।
      • पहला इंजेक्शन-काटने के पहले दिन
        दूसरा इंजेक्शन-काटने के तीसरे दिन
        तीसरा इंजेक्शन-काटने के सातवें दिन
        चौथा इंजेक्शन-काटने के 14वें दिन
        पांचवां-काटने के 28वें दिन

      • आमतौर पर पैसिव वैक्सिनेशन ही किया जाता है। लेकिन ज्यादा जख्म होने पर ऐक्टिव और पैसिव, दोनों तरह का वैक्सिनेशन किया जाता है। वैक्सिनेशन को बीच में छोड़ना या समय से न लेना खतरे को बढ़ावा देना है। चूंकि हमारा देश जानवरों के काटने से फैलने वाली बीमारियों के असर में है, इसलिए डॉक्टर सलाह देते हैं कि लोगों को प्री-एक्सपोजर वैक्सिनेशन (काटने के पहले) जरूर लेना चाहिए। इसके तहत तीन इंजेक्शन लगाए जाते हैं। तीनों इंजेक्शन का कोर्स जरूरी है।
      • प्री-एक्सपोजर वैक्सिनेशन का असर दो साल तक रहता है। इस दरम्यान अगर कुत्ता, बिल्ली या बंदर काटता है तो रेबीज की आशंका नहीं रहती। फिर भी अगर जख्म गहरा हो तो आप डॉक्टर से दिखाकर उसकी राय जरूर लें और अगर वह कहे कि ऐक्टिव या पैसिव वैक्सिनेशन की दरकार है तो उसके लिए जरूर जाएं।
      • पालतू कुत्ते के साथ भी सावधानी बरतनी चाहिए। आप उसका पूरा वैक्सिनेशन कराएं, ताकि उसके शरीर में रेबीज का वायरस न पनपे। अगर आप दूसरे से बड़ा कुत्ता ले रहे हैं तो भी उसके वैक्सिनेशन के बारे में जरूर पूछें।
      • वैक्सिनेशन कराने पर प्राइवेट हॉस्पिटल में करीब 2 हजार रुपए का खर्च बैठता है। ऐसे करें बचाव
      • कुत्ते, बिल्ली या बंदर अमूमन किसी को काटने नहीं दौड़ते, लेकिन रेबीज इन्फ़ेक्टेड जानवर आपको परेशान कर सकते हैं।
      • सामान्य कुत्ते भी आपकी परेशानी का सबब बनते रहते हैं। ऐसे में आपको अपना बचाव खुद करना पड़ता है

      Saturday, August 19, 2017

      जानिए क्या है डीप वेन थ्रोम्बोसिस-What Is Deep Vein Thrombosis In Hindi,

      डीप वेन थ्रोमबोसिस (डीवीटी) बीमारी है शरीर की नसों में ख़ून जमने की. ये ब्लड क्लॉट आम तौर पर पैरों की नसों में पाए जाते हैं. हालांकि ये एक बहुत ही आम बीमारी है लेकिन अनदेखी करने पर थ्रोमबोसिस जानलेवा भी हो सकती है. रक्त वाहिकाओं में जब खून का थक्का जम जाता है तब उसे थ्रोम्बोसिस कहते हैं. अगर यह शरीर के भीतरी नसों में होता है, तो उसे ‘डीप वेन थ्रोम्बोसिस’ कहते हैं. यह अकसर पैर की नसों में होता है. यह बीमारी खतरनाक रूप तब लेती है जब यह खून का थक्का, पैर से निकल कर फेफड़ों तक पहुंच जाता है.

      डीप वेन थ्रोम्बोसिस दो प्रकार के कारणों से हो सकता है.

      1- खून का बहाव धीरे है या रुक गया है. जैसे...

      • किसी बीमारी या गर्भ में बिस्तर पर लेटे रहने से
      • अधिकतर खड़े होकर काम करते हैं, जैसे कि अध्यापक, नर्स, सर्जन या अन्य.
      • लंबे समय तक पैर नहीं चलाते हैं, जैसे कि बहुत देर का विमान यात्रा
      • दूसरा कि खून में जमने का प्रवृती बढ़ गई है

      2- सामान्य स्थिती में यहाँ दोनों तरह के पदार्थ संतुलित मात्रा में रहते हैं. अगर किसी कारण से यह संतुलन बिगड़ता है, तो नसों के अंदर खून जम सकता है. जैसे...

      • किसी भी प्रकार का सर्जरी, जो कि पैर, जांघ, कमर या पेल्विस पर की गई हो.
      • कैंसर होने से डीप वेन थ्रोम्बोसिस का खतरा बढ़ जाता है.
      • धूम्रपान करने से डीप वेन थ्रोम्बोसिस का खतरा बढ़ जाता है.
      • दिल का बीमारी होने से, जिसमें दिल कमजोर हो जाता है. इसे कांजेसटिव हार्ट फैलिअर (congestive heart failure) कहते हैं. इस स्थिती में ह्रदय खून को पम्प करने में सक्षम नहीं होता और खून पैरों में जमा होने लगता है.
      • पैर के नसों के कमजोरी से भी खून पैरों में जमा होने लगता है. सामान्य स्थिती में खून को पैर से दिल के तरफ लौटना चाहिए लेकिन इस अवस्था में पैर में खून जाने के लिए एक वाल्व होता है, जो खून के बहाव को ह्रदय की तरफ रखता है. अगर नसों के वाल्व में कमजोरी आ जाती है, तो खून के बहाव में भी रूकावट आ जाती है, और फिर पैर में खून जमा होने लगता है. महिलाओं में ये इन अवस्थाओं में अधिक होता है यदि...
      • आप गर्भ निरोधक गोली (oral contraceptive pills) लेती हैं
      • अगर आप मोटापे से पीड़ित हैं
      • अगर आपका मेनोपौज़ (menopause) हो चुका है

       डीप वेन थ्रोम्बोसिस ke लक्षण

      पहली अवस्था में इसका कोई लक्षण नहीं होता. लेकिन जब खून के थक्के जमा होने लगते है, तब इसके लक्षण प्रकट हो जाते हैं. यह लक्षण पैरों में होते हैं यानी तलवे से लेकर जांघ तक कोई भी जगह
      • पैर का फूलना
      • पैर में दर्द होना
      • पैर लहराना
      • पैर में अत्यन्त खुजली होना
      • पैर का रंग बदलना - लाल या नीला पड़ जाना

      यूं करें जांच

      • सोनोग्राम (sonogram) - मशीन द्वारा बाहर से नसों का फोटो खींचा जा सकता है.
      • वेनोग्राफी (contrast venography) - नसों में सुई द्वारा रंग दिया जाता, और फिर उसका फोटो खीचा जाता है
      • इम्पेडांस प्लेथिस्मोग्राफी (impedance plethysmography) - इसमें बिजली के तरंगों से इस रोग को जांचा जाता है

      डीप वेन थ्रोम्बोसिस की रोकथाम

      • पैर मांसपेशियों की गतिविधियों में बैठे की लंबी अवधि के दौरान वृद्धि पैरों में रक्त के प्रवाह को बेहतर बनाता है। इस चलने के आसपास केबिन या आपके कम पैर और जबकि बैठा टखने कसरत शामिल हो सकते हैं।
      • पानी का खूब सेवन, और कुछ भी शराब या उसमें कैफीन के साथ शराब पीने से बचें।
      • ढीले-ढाले कपड़े पहन लो।
      • कुछ लंबे समय लोगों को लंबे समय तक निष्क्रियता से बचने के लिए, के बजाय कम naps लेने की सिफारिश।
      • नियमित रूप से व्यायाम, एक स्वस्थ वजन को बनाए रखने, और सिगरेट नहीं पीता।
      • यदि आप जोखिम वाले कारकों में से किसी के लिए DVT है, तो लंबे दौरों से पहले अपने चिकित्सक से परामर्श करें।

      क्या है इसका इलाज

      • डीप वेन थ्रोम्बोसिस’ में खून के थक्कों को गलाने के लिए दवा दी जाती है. इसके लिए हॉस्पिटल में एडमिट होना जरुर है क्योंकि इसकी दवा खून को पतला करती है जिसके लिए कई बार खून की जाँच की जाना जरुरी होता है. 
      • इस दवा को कम-से-कम 6 माह तक दिया जाना जरुरी होता है. इसके साथ ही उन कारणों को भी पहचान कर दूर करना होता है जिस वजह से ‘डीप वेन थ्रोम्बोसिस’ बीमारी होती है.

      Thursday, April 06, 2017

      पैरालिसिस (लकवा)का घरेलू इलाज. Paralysis ka Gharelu ilaj ,Paralysis Treatment in Hindi,

      ये हमारा दावा है कि सिर्फ 7 दिन में लकवा/पक्षाघात (Paralysis) का रोगी ठीक होगा वो भी निःशुल्क, बहुत ही महत्त्वपूर्ण पोस्ट है जरूर पढ़े और शेयर करे पक्षाघात (लकवा) या अँग्रेजी मे पेरालाइसिस का एकदम प्रमाणिक और राम-बाण इलाज़।
      जीवन मे चाहे धन, एश्वर्य, मान, पद, प्रतिष्ठा आदि सभी कुछ हो, परंतु शरीर मे बीमारी है तो सब कुछ बेकार है ओर जीवन भी नीरस है। ऐसी ही एक बीमारी है पक्षाघात, जिससे पीड़ित व्यक्ति जीवनभर सारे परिवार पर बोझ बन जाता है।
      पक्षाघात पीड़ित व्यक्तियों के किए आज की ये पोस्ट एक नयी सुबह साबित होगी ये हमारा दावा है। पक्षाघात (लकवा) या अँग्रेजी मे पेरालाइसिस का एकदम प्रमाणिक ओर राम-बाण इलाज़। 

      लकवा रोग का लक्षण

        • जैसे किसी का मुह टेढ़ा हो जाना, आँख का टेढ़ा हो जाना, हाथ या पैर का टेढ़ा हो जाना, या शरीर किसी एक साइड से बिलकुल काम करना बंद कर दे, ये सामान्यतया पक्षाघात की पहचान है।
        • लकवा रोग से पीड़ित रोगी के शरीर का एक या अनेकों अंग अपना कार्य करना बंद कर देते हैं।
        • इस रोग का प्रभाव अचानक होता है लेकिन लकवा रोग के शरीर में होने की शुरुआत पहले से ही हो जाती है। लकवा रोग से पीड़ित रोगी के बायें अंग में यदि लकवा मार गया हो तो वह बहुत अधिक खतरनाक होता है
        • क्योंकि इसके कारण रोगी के हृदय की गति बंद हो सकती है और उसकी मृत्यु भी हो सकती है। रोगी के जिस अंग में लकवे का प्रभाव है, उस अंग में चूंटी काटने से उसे कुछ महसूस होता है 

        पैरालिसिस (लकवा)का घरेलू इलाज. Paralysis ka Gharelu ilaj ,Paralysis Treatment in Hindi,

        • अगर मेरा कोई भाई बहिन पक्षाघात से पीड़ित है तो कहीं जाने की जरूरत नहीं है। अगर शरीर का कोई अंग या शरीर दायीं तरफ से लकवाग्रस्त है तो उसके लिए व्रहतवातचिंतामणि रस (वैदनाथ फार्मेसी) की ले ले। उसमे छोटी-छोटी गोली (बाजरे के दाने से थोड़ी सी बड़ी) मिलेंगी। उसमे से एक गोली सुबह ओर एक गोली साँय को शुद्ध शहद से लेवें।
        • अगर कोई भाई बहिन बायीं तरफ से लकवाग्रस्त है उसको वीर-योगेन्द्र रस (वैदनाथ फार्मेसी) की सुबह साँय एक एक गोली शहद के साथ लेनी है।
        • अब गोली को शहद से कैसे ले………? उसके लिए गोली को एक चम्मच मे रखकर दूसरे चम्मच से पीस ले, उसके बाद उसमे शहद मिलकर चाट लें। ये दवा निरंतर लेते रहना है, जब तक पीड़ित स्वस्थ न हो जाए।
        • पीड़ित व्यक्ति को मिस्सी रोटी (चने का आटा) और शुद्ध घी (मक्खन नहीं) का प्रयोग प्रचुर मात्र मे करना है। शहद का प्रयोग भी ज्यादा से ज्यादा अच्छा रहेगा।
        • लाल मिर्च, गुड़-शक्कर, कोई भी अचार, दही, छाछ, कोई भी सिरका, उड़द की दाल पूर्णतया वर्जित है। फल मे सिर्फ चीकू ओर पपीता ही लेना है, अन्य सभी फल वर्जित हैं।
        • शुरुआती दिनों मे किसी भी मालिस से परहेज रखें। तब तक कोई मालिस न करें जब तक पीड़ित कम से कम 60% तक स्वस्थ न हो जाए।
        • ये दवा लाखों पीड़ित व्यक्तियों के लिए जीवनदायिनी रही है। जो आज स्वस्थ जीवन जी रहे है।

        Sunday, March 19, 2017

        आंखों के नीचे काले घेरे ऐसे करें दूर,How to Remove Dark Circles in Hindi,

        आंखों के नीचे काले घेरे ऐसे करें दूर,How to Remove Dark Circles in Hindi,
        काले घेरे एक आम समस्या है जो बहुत लोगों को प्रभावित करती है। यह महिलाओं और पुरुषों दोनों को प्रभावित करता है लेकिन महिलाओं में यह ज्यादा देखा जाता है। आँखों के आसपास की त्वचा कहीं ज्यादा नाजुक होती है और चेहरे के अन्य भागों की अपेक्षा पतली भी, इसलिये इसे ज्यादा ध्यान देने की आवश्यकता है।  How to Remove Dark Circles
        जब आँखों के नीचे का रंग बदल जाता है और उसमे कालापन आ जाता है। तो इस आँखों का काला घेरा ( Dark Circle ) कहते है। यह समस्या विशेषकर लड़कियों और महिलाओं में ज्यादा होती है। मनुष्य का चेहरा हे उसके दिल और स्वास्थ्य के बारे में पूरी जानकारी दे देता है। जब कोई बीमार होता है या तनाव में होता है तो उसके आँखों के नीचे काले घेरे जैसे बन जाते है , जिसे हम डार्क सर्कल कहते हैं। 

        आंखों के नीचे कालापन का  कारण

        इसके पीछे कई कारण होते हैं

        • जैसे शरीर में पानी की कमी, तनाव, धूप और प्रदूषण में ज्यादा देर रहना, अनियमित दिनचर्या आदि। कई बार हम समझ नहीं पाते, लेकिन डार्क सर्कल्स की समस्या एलर्जी का भी नतीजा हो सकता है। यह एलर्जी किसी क्रीम, कॉस्मेटिक या दवाई से हो सकती है। ऐसे मामलों में तुरंत डॉक्टरी सलाह लेने में ही भलाई है, नहीं तो समस्या कोई और रूप ले सकती है। 
        • यह समस्या अनुवांशिक भी हो सकती है। इसके अलावा कुछ दवाओं के सेवन (मेडिकेशन) से, थकान से, यकृत (लीवर) की समस्या के कारण, एक्जिमा, अस्थमा आदि के कारण, रक्त की कमी (रक्तक्षीणता) के कारण या उम्र की अधिकता से भी हो सकती है।
        • कई बार बहुत अधिक तनाव लेने की वजह से आंखों के नीचे काले घेरे बन जाते हैं. इसके अलावा कम सोने, हार्मोन्स में परिवर्तन होने, अव्यवस्थित लाइफस्टाल होने या फिर हेरेडेट्री होने की वजह से भी आंखों के नीचे काले घेरे बन जाते हैं.
        • नींद पूरी  न होने से भी आँखों के नीचे काले घेरे हो जाते हैं। 
        • खान - पान सही न होना। 
        • बहुत ज्यादा थकान। 
        • सिगरेट , शराब का बहुत मात्रा में सेवन करना। 
        • हार्मोन का असंतुलन। 
        • कैल्शियम  और आयरन  की कमी। 

        आंखों के नीचे काले घेरे ऐसे करें दूर,How to Remove Dark Circles in Hindi,

        ऐसे में इन घरेलू नुस्खों को अपनाकर डार्क सर्कल्स को दूर किया जा सकता है:
        • 50 ग्राम तुलसी के पत्ते, नीम के पत्ते और पुदीने के पत्तों को गुलाबजल में मिक्स कर के पीस लें। इस रस में थोड़ा हल्दी पाउडर मिक्स कर के पेस्ट बना लें और इस पेस्ट को काले घेरों पर लगाएं, ऐसा करने से डार्क सर्कल की समस्या काफी हद तक कम हो जाएगी। 
        • संतरे या गाजर का रस संतरे या गाजर का रस निकालें और रूई को उसमें भिगो कर कुछ देर तक आंखों पर रखें। इससे डार्क सर्कल में काफी हद तक फायदा पहुंचेगा। रोगन बादाम से मसाज रात को सोने से पहले आधा चम्मच रोगन बादाम, तीन बूंद प्योर आरेंज आयल और दो बूंद शहद को मिक्स कर लें। इस मिश्रण को तर्जनी उंगली में लेकर आंखों के चारों ओर हल्के-हल्के से गोलाई में मालिश करें। इससे काफी लाभ मिलेगा। 
        • डार्क सर्कल दूर करने के लिए टमाटर सबसे कारगर उपाय है. ये नेचुरल तरीके से आंखों के नीचे के काले घेरे को खत्म करने का काम करताहै. साथ ही इसके इस्तेमाल से त्वचा भी कोमल और फ्रेश बनी रहती है. टमाटर के रस को नींबू की कुछ बूंदों के साथ मिलाकर लगाने से जल्दी फायदा होता है.
        • डार्क सर्कल दूर करने के लिए आलू का भी प्रयोग किया जा सकता है. आलू के रस को भी नींबू की कुछ बूंदों के साथ मिला लें. इस मिश्रण को रूई की सहायता से आंखों के नीचे लगाने से काले घेरे समाप्त हो जाएंगे .
        • ठंडे टी-बैग्स के इस्तेमाल से भी डार्क सर्कल जल्दी समाप्त हो जाते हैं. टी-बैग को कुछ देर पानी में डुबोकर रख दें. उसके बाद इसे फ्रिज में ठंडा होने के लिए रख दें. कुछ देर बाद इसे निकालकर आंखों पर रखकर लेट जाएं. 10 मिनट तक रोज ऐसा करने से फायदा होगा. 
        • ठंडे दूध के लेप से भी आंखों के नीचे का कालापन दूर हो जाता है. कच्चे दूध को ठंडा होने के लिए रख दें. उसके बाद कॉटन की मदद से उसे आंखों के नीचे लगाएं. ऐसे दिन में दो बार करने से जल्दी फायदा होगा.
        • संतरे के छिलके को धूप में सुखाकर पीस लें. इस पाउडर में थोड़ी सी मात्रा में गुलाब जल मिलाकर लगाने से काले घेरे खत्म हो जाएंगे. How to Remove Dark Circles
        • आँखों की गर्मी या आँख आने परः नींबू एवं गुलाबजल का समान मात्रा का मिश्रण एक-एक घण्टे के अंतर से आँखों में डालने से एवं हल्का-हल्का सेंक करते रहने से एक दिन में ही आयी हुई आँखें ठीक होती हैं

        Tuesday, March 07, 2017

        रेबीज से बचने के उपाय,Rabies Prevention in Hindi,

        रेबीज से बचने के उपाय,Rabies Prevention in Hindi,
        कुत्ते बंदर के काटने पर कभी भी लापरवाही न बरतें अन्यथा आप रेबीज का शिकार हो सकते हैं। जब कोई कुत्ता या बंदर काटे तो तुरंत नजदीकी चिकित्सक से इलाज करवाएं। ग्रामीण क्षेत्रों में लोग अक्सर में कुत्ते या बंदर के काटने पर घूरेलू उपचार करने लग जाते हैं। इससे रेबीज का खतरा बढ़ जाता है व घायल व्यक्ति की मौत भी हो सकती है

        किसी संक्रमित पशु के काटने या खुले घाव को चाटने से यह इन्फेक्शन होता है। यह इन्फेक्शन पशुओं में लड़ने या काटने से फैलता है। जब ऐसे संक्रमित पशु आदमी के संपर्क में आते हैं तो इसे आदमी में भी फैलाते हैं। आदमी से आदमी में यह इन्फेक्शन नहीं फैलता। वायरस आदमी के शरीर में प्रवेश करने यह इंद्रियों पर आक्रमण करता है और मेरूदंड से मस्तिष्क तक जाकर एनसेफ लाइटिस उत्पन करता है जो कि घातक होती है। इनफेक्शन के फैलने से बचने का उपाय एंटीबॉडिज है जो टीकाकरण द्वारा दिया जाता है। यह काटने के 24 घटे भीतर दिया जाना चाहिए। इससे इन्फेक्शन रुक जाता है।

        रेबीज से बचने के उपाय,Rabies Prevention in Hindi,

        इन सभी लक्षणों से बचना है तो कुत्ता, बिल्ली या बंदर के काटने के 24 घंटे के अंदर ऐंटि-रेबीज टीकों के जरिए इलाज शुरू करवा दें।
        • अगर कुत्ता प्यार से भी चाटता है, तो होशियार हो जाएं। अगर कुत्ते में रेबीज का इन्फ़ेक्शन होगा तो आपके शरीर में रेबीज के वायरस जाने की आशंका बनी रहती है, खासकर अगर कुत्ते ने शरीर के उस हिस्से को चाट लिया हो, जहां चोट की वजह से मामूली कट या खरोंच हो।
        • अगर किसी कुत्ते के काटने के बाद स्किन पर उसके एक या दो दांतों के निशान दिखाई पड़ते हैं, तो समझिए कि एहतियात बरतने की जरूरत है।
        • ऐसे कई लोग हैं, जो यह सोचकर कि कुत्ते को रेबीज न रहा होगा, एक या दो दांतों के निशान को मामूली जख्म की तरह ट्रीट करते हैं।
        • ऐसी अनदेखी घातक साबित हो सकती है, क्योंकि रेबीज का वायरस एक बार आपके शरीर में जाकर बरसों-बरस डॉर्मन्ट (सुप्तावस्था में) रह सकता है।
        • कई बरस बाद जब यह अपना असर दिखाना शुरू करता है तो इलाज के लिए कुछ नहीं बचता।
        • कुत्ता आमतौर पर तीन जगहों में किसी एक जगह पर काटता है: हाथ, चेहरा या टांग।
        • अगर हाथ या चेहरे पर काटने के बाद एक भी गहरा निशान बनता है या दांतों के तीन-चार निशान दिखाई देते हैं तो समझिए मामला बेहद संजीदा है और इलाज के लिए फौरन जाना चाहिए।
        • जितना हो सके घाव को बहते गुनगुने पानी से धोना चाहिए ।
        • घाव को कभी ढकें नहीं। इसकी पट्टी न करें और टांकें न लागवाएं।
        • नजदीकी दवाखाने में या सरकारी अस्पताल में जाएं जहां एआरवी उपलब्ध होती हैं।
        • कुत्ता या पशु का निरीक्षण 10 दिन तक करें।
        • यदि कुत्ता पालतू है तो जानें कि उसे टीका दिलाया गया अथवा नहीं और जानें की उसे घुमाने ले जाया जाता है या नहीं।
        • कुत्ते, बिल्ली या बंदर के काटने को हल्के में लेना बड़ी भूल है। इससे जानलेवा रेबीज हो सकता है।
        • कुत्ते के काटने के बाद अब भी कई लोगों को यह लगता है कि पेट में 14 इंजेक्शन लगेंगे। यह गलत है। वैक्सिनेशन के तरीके और टाइम पीरियड अब बदल चुके हैं। यह भी जान लेना जरूरी है कि कुत्ते, बिल्ली या बंदर के काटने पर आपके काम का डॉक्टर जनरल फिजिशन (फैमिली डॉक्टर) ही है।
        • रेबीज को रोकने के लिए प्रॉपर वैक्सिनेशन (ऐंटि-रेबीज वैक्सिनेशन) की जाती है।
        • ऐंटि-रेबीज वैक्सीन सेंट्रल नर्वस सिस्टम (जहां रेबीज के वायरस अटैक करते हैं) पर रक्षात्मक परत बना कर उस वायरस के असर को खत्म कर देती है।
        • वैक्सिनेशन दो तरह से की जाती है: ऐक्टिव और पैसिव। अगर जख्म गहरा हो तो ऐक्टिव वैक्सिनेशन के तहतदो इंजेक्शन फौरन लगते हैं। इसमें ऐंटि-रेबीज सीरम कोपहले मसल्स (बाजू या हिप्स) में और फिर ठीक उस जगह पर जहां कुत्ते, बिल्ली या बंदर ने काटा हो, इंजेक्शन के जरिए डाला जाता है।
        • इसके बाद बारी आती है पैसिव वैक्सिनेशन की। इसमें पांच इंजेक्शन एक खास टाइम पीरियड में लेने पड़ते हैं।

        Friday, March 03, 2017

        रेबीज क्या है,What is Rabies in Hindi,

        रेबीज क्या है,What is Rabies in Hindi,
        रेबीज़ एक न्यूरो इनवेसिव (Neuro-Invasive) वायरल बीमारी है। रेबीज़ का वायरस तंत्रिका तंत्र यानि सेंट्रल नर्वस सिस्टम (Central Nervous System) पर अटैक करता है, जिससे पीड़ित व्यक्ति सामान्य नहीं रह पाता क्यों होता है रेबीज़ (Causes of Rabies) रेबीज़ (Rabies​) कुत्तों या अन्य पशुओं जैसे भेड़िया, लोमड़ी, सियार, गीदड़ चमगादड़, भेड़, गाय, बन्दर, घोड़ा, बिल्ली के काटने से होने वाला रोग है । पालतू जानवर के थूक के संपर्क में आने पर भी रेबीज़ रोग हो सकता है।रेबीज़ से होने वाली मौतें (Death Due to Rabies​) विश्व स्वास्थ्य संगठन की तालिका में रेबीज़ (Rabies​) से होने वाली मौतें बारहवें क्रम पर हैं। विश्व में जानवरों के काटने के चालीस लाख मामले प्रतिवर्ष होते हैं। इलाज की अज्ञानता अथवा उपचार के अभाव में साठ हजार मौतें विश्व में प्रतिवर्ष होती हैं। सर्वाधिक मौतें एशिया में होती हैं। पशुओं के काटने के पाँच लाख मामले प्रतिवर्ष दर्ज कराए जाते हैं, जिनमें चार लाख पच्चीस हजार मामले कुत्तों के काटने के होते है।

        रेबीज के लक्षण Symptoms Rabies in Hindi

        • हिंसक गतिविधि, अनियंत्रित उत्तेजना, पानी से डर, शरीर के अंगों को हिलाने में असमर्थता, भ्रम, और होश खो देना  What is Rabies in Hindi
        • पानी से डर (हाइड्रोफोबिया) - प्यास के बावजूद पानी न पीना
        • बात-बात पर भड़क जाना - बर्ताव में हिंसक हो जाना
        • लक्षण प्रकट होने के बाद, रेबीज़ का परिणाम लगभग हमेशा मौत है।
        • रोग संक्रमण और लक्षणों की शुरुआत के बीच की अवधि आमतौर पर एक से तीन महीने होती है। तथापि, यह समय अवधि एक सप्ताह से कम से लेकर एक वर्ष से अधिक तक में बदल सकती है।
        • यह समय अवधि उस दूरी पर निर्भर करता है जिसे विषाणु के लिए केंद्रीय स्नायुतंत्र तक पहुँचने के लिए तय करना आवश्यक है। 
        • रेबीज़ इंसानों में अन्य जानवरों से संचारित होता है। जब कोई संक्रमित जानवर किसी अन्य जानवर या इंसान को खरोंचता या काटता है तब रेबीज़ संचारित हो सकता है।
        • किसी संक्रमित जानवर के लार से भी रेबीज़ संचारित हो सकता है यदि लार किसी अन्य जानवर या मनुष्य के श्लेष्मा झिल्ली (Mucous Membrane) के संपर्क में आता है।
        • मनुष्यों में रेबीज़ के अधिकतर मामले कुत्तों के काटने से होते हैं
        • उन देशों में जहाँ कुत्तों में आम तौर पर रेबीज़ होते हैं, रेबीज़ के 99% से अधिक मामले कुत्तों के काटने से होते हैं। 
        • अमेरिका में, मनुष्यों में रेबीज़ संक्रमण का सबसे आम स्रोत चमगादड़ का काटना है, और 5% से कम मामले कुत्तों से होते हैं
        • कृन्तक (Rodents) बहुत कम ही रेबीज़ से संक्रमित होते हैं।
        • रेबीज़ वायरस परिधीय तंत्रिकाओं (peripheral nerves) के माध्यम से मस्तिष्क तक पहुँचता है। रोग की पहचान केवल लक्षणों की शुरुआत के बाद ही की जा सकती है।
        • रेबीज की सबसे विशेषता लक्षण प्रकट होता है।आप किसी भी तरल, यहां तक ​​कि लार निगल रोगी का प्रयास करते हैं, गला और ग्रसनी की मांसपेशियों की ऐंठन नहीं है।
        • प्रकार और चल रहे पानी की भी ध्वनि, और यहां तक ​​कि डर की उपस्थिति और इस तरह के एक ऐंठन के विकास के कारण पानी के बारे में बात करते हैं।
        • आप रोगी के एक कप पीने की कोशिश करते हैं, तो वह झुकता है, धक्का वापस उसके सिर फेंकता है।कुछ उभड़ा आंखें, कुछ बिंदु पर निर्देशित पुतली का विस्तार निगाहें, मुश्किल सांस, पसीना बढ़ जाती है: यह भय व्यक्त करता है जब मरीज का चेहरा नीला पड़ जाता है।मांसपेशियों की अकड़नेवाला संकुचन के हमलों, अल्पकालिक (हालांकि कुछ ही सेकंड तक चलने वाले), लेकिन वे अक्सर दोहराया जाता है।
        • हमले तरल की उपस्थिति, और हवा के एक विमान या एक जोर से दस्तक ध्वनि, एक चमकदार रोशनी न केवल उत्तेजित कर सकते हैं।इसलिए, रोगी रेबीज (जलांतक), लेकिन यह भी Aerophobia, phonophobia, फोटोफोबिया न केवल विकसित करता है।बढ़ी हुई पसीना, प्रचुर नोट और लार को अलावा।आंदोलन और आक्रामकता और क्रोध नहीं है।मरीजों को मारा, खुद के लिए कपड़े को तोड़ सकते हैं, वे थूक, काट सकती है। What is Rabies in Hindi
        • यह लोगों का कहना है कि जब अनुचित हिंसक और आक्रामक व्यवहार, मतलब है "एक पागल की तरह व्यवहार कर रही।"हमले के दौरान भ्रम चिह्नित भयावह दृश्य और श्रवण मतिभ्रम दिखाई देते हैं।

        Monday, February 20, 2017

        हाथ और पैरों के तलवों में जलन,Home Remedies For Burning Feet In Hindi,

        हाथ और पैरों के तलवों में जलन,Pairo-ke-Taluo-ki-Jalan-Dur-Karane-ke-Upay
        अक्सर कई लोगो को हाथो और पैरो में जलन होती हैं, वैसे तो ये समस्या गर्मियों में अधिक होती हैं, मगर कई बार कुछ बीमारियो के कारण ये सर्दियों में भी होती हैं। आज हम आपको बताएँगे इसके कारण और इसके सरल उपचार।

        पैरों में जलन के कारण ,Causes of Burning Legs 

        • तंत्रिका तंत्र में शिथिलता या कमजोरी 
        • मधुमेह
        • अधिक शराब का सेवन 
        • विषाक्त पदार्थों का सेवन 
        • विटामिन बी, कैल्शियम और फोलिक एसिड की कमी 
        • किडनी रोग
        • पैर सिंड्रोम
        • अधिक गर्म दवाओं का सेवन
        • रक्त प्रवाह का कम होना  

        हाथ और पैरों के तलवों में जलन,Pairo-ke-Taluo-ki-Jalan-Dur-Karane-ke-Upay

        • करेला : करेले के पत्तों का रस निकालकर पैरों के तलुवों पर इसकी मालिश करने से पैरों की जलन दूर हो जाती है। करेले के पत्तों को पीसकर पैरों पर लेप करने से भी इस रोग में लाभ होता है।
        • सरसो का तेल और लहसुन : सरसो के तेल में 3-4 लहसुन की कलियाँ काट कर तब तक गरम करे जब तक लहसुन की कलियाँ काली ना पड़ जाये। फिर उस तेल से हथेली और पैरो के तलवो में मालिस करने से जलन में आराम मिल जायेगा। सरसो के तेल में अनामिका ऊँगली को डुबो कर अपनी नाभि पर लेटकर गोल गोल तब तक घुमाए जब तक नाभि सारा तेल ना सोख ले। यह दोनों सबसे उत्तम तरीके है जलन से निजात पाने के।
        • लौकी : लौकी को काटकर इसके गूदे को पैरों के तलुवों पर लगाने से पैरो की गर्मी, जलन आदि दूर हो जाती है।
        • सरसों : हाथ-पैरों या पैरों के तलुवों में जलन होने पर सरसों का तेल लगाने से लाभ होता है। 2 गिलास गर्म पानी में 1 चम्मच सरसों का तेल मिलाकर रोजाना दोनों पैर इस पानी के अंदर रखें। 5 मिनट के बाद पैरो को किसी खुरदरी चीज से रगड़कर ठण्डे पानी से धोने से पैर साफ रहते हैं और पैरों की गर्मी दूर होती है।
        • मेहंदी : गर्मी के मौसम में जिन लोगों के पैरों में लगातार जलन होती रहती है उनकें पैरों में मेंहदी लगाने से उनकी जलन दूर हो जाती है।
        • आम : आम की बौर (फल लगने से पहले निकलने वाले फूल) को रगड़ने से हाथों और पैरों की जलन समाप्त हो जाती है।
        • धनिया : सूखे धनिये और मिश्री को बराबर मात्रा में लेकर पीस लें। फिर इसको 2 चम्मच की मात्रा में रोजाना 4 बार ठंडे पानी से लेने से हाथ और पैरों की जलन दूर हो जाती है।
        • मक्खन : मक्खन और मिश्री को बराबर मात्रा में मिलाकर लगाने से हाथ और पैरों की जलन दूर हो जाती है। 
        • कतीरा (कतीरा एक प्रकार का गोंद होता है) : 2 चम्मच कतीरा को रात को सोने से पहले 1 गिलास पानी में भिगों दें। सुबह कतीरा के फूल जाने इसको शक्कर के साथ मिलाकर रोजाना खाने से हाथों और पैरों की जलन दूर हो जाती है। वैसे तो यह हर मौसम में काम आता है लेकिन गर्मियों में बहुत ही लाभदायक होता है।
        • विटामिन : शरीर में विटामिन बी-1 की कमी के कारण भी पैरो के तलुओ में जलन होती हैं इसलिए भोजन में विटामिन बी-1 का इस्तेमाल करे। इसके लिए मटर, हरी सब्जिया, आलू, दूध, अंकुरित गेंहू, काजू इसके अच्छे स्त्रोत हैं।
        • ब्लड शुगर : अपनी ब्लड शुगर की भी जांच ज़रूर करवाये, कुछ रोगियों को ब्लड शुगर के कारण ऐसी समस्याओ का सामना करना पड़ता हैं।

        Thursday, February 16, 2017

        गाँठ का उपचार,Lump Treatment in Hindi,Lump Treatment in Ayurveda

        अक्सर हमारे शरीर के किसी भी भाग में गांठे बन जाती हैं. जिन्हें सामान्य भाषा में गठान या रसौली कहा जाता हैं. किसी भी गांठ की शुरुआत एक बेहद ही छोटे से दाने से होती हैं. लेकिन जैसे ही ये बड़ी होती जाती हैं. इन गाठों की वजह से ही गंभीर बीमारियां भी हो जाती हैं. 
        • ये गांठे टी.वी से लेकर कैंसर की बीमारी की शुरुआत के चिन्ह होती हैं. अगर किसी व्यक्ति के शरीर के किसी भाग में कोई गाँठ हो गई हैं. जिसक कारण उस गाँठ से आंतरिक या बाह्य रक्तस्राव हो रहा हो. तो हो सकता हैं कि यह कैंसर की बीमारी के शुरुआती लक्षण हो. 
        • लेकिन इससे यह भी सुनिश्चित नहीं हो जाता कि ये कैंसर के रोग को उत्पन्न करने वाली गांठ हैं. कुछ गाँठ साधारण बिमारी उत्पन्न होने के कारण भी हो जाती हैं. 
        • किन्तु हमें किसी भी प्रकार की गांठों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए तथा उसका तुरंत ही उपचार करवाना चाहिए. 
        • कुछ स्त्रियाँ या पुरुष नासूर या ऑपरेशन कराने के डर से जल्द गाँठ का इलाज नहीं करवाते. लेकिन ऐसे व्यक्तियों के लिए यह समझना बहुत ही आवश्यक हैं कि इन छोटी सी गांठों को यदि आप लगातार नजरअंदाज करेंगें. 
        • तो इन गांठों की ही वजह से ही आपको बाद में अधिक परेशानी का सामना करना पड सकता हैं. आज हम आपको शरीर के किसी भी भाग में होने वाली गांठ को ठीक करने के लिए कुछ आयुर्वेदिक उपचारों के बारे में बतायेंगें.

        गाँठ का उपचार,Lump Treatment in Hindi,Lump Treatment in Ayurveda,

        • कचनार की छाल और गोरखमुंडी (Bauhinia Bark And Gorkmundi) किसी भी तरह की गाँठ को ठीक करने के लिए 25 से 30 ग्राम तक कचनार की ताज़ी और सुखी छाल लें और इसे मोटा – मोटा कूट लें. अब एक गिलास पानी लें और इस पानी में कचनार की कुटी हुई छाल डालकर 2 मिनट तक उबाल लें.जब यह अच्छी तरह से उबल जाएँ. तो इसमें एक चम्मच पीसी हुई गोरखमुंडी डाल दें. अब इस पानी को एक मिनट तक उबालें. 
        • इसके बाद आप इस पानी को छानने के बाद इसका दिन में दो बार सेवन कर सकते हैं. इस पानी का सेवन करने के बाद आपको गलें, जांघ, हाथ, प्रोटेस्ट, काँख, गर्भाशय, टॉन्सिल, स्तन तथा थायराइड के कारण निकली हुई गाँठ से लगातार 20 – 25 दिनों तक सेवन करने से छुटकारा मिल जाएगा. 
        • आकडे का दूध (Figures Milk) – गाँठ को ठीक करने के लिए आप आकडे के दूध में मिटटी मिला लें. अब इस दूध का लेप जिस स्थान पर गाँठ हुई हैं. वहाँ पर लगायें आपको आराम मिलेगा. 
        • निर्गुण्डी (Nirgundi) – किसी भी प्रकार की गाँठ से मुक्त होने के लिए 20 से 25 मिली काढ़ा लें और उसमें 1 से 5 मिली लीटर तक अरंडी का तेल मिला लें. इन दोनों को अच्छी तरह से मिलाने के बाद इस मिश्रण का सेवन करें. तो आपकी गांठ ठीक हो जायेगी. 
        • गेहूं का आटा (Wheat Flour) – गेहूं का आटा लें और उसमें पानी डाल लें. अब इस आटे में पापड़खार मिला लें और इसका सेवन करें. आपको लाभ होगा. 
        • गण्डमाला की गाँठें (Goitre) गले में दूषित हुआ वात, कफ और मेद गले के पीछे की नसों में रहकर क्रम से धीरे-धीरे अपने-अपने लक्षणों से युक्त ऐसी गाँठें उत्पन्न करते हैं जिन्हें गण्डमाला कहा जाता है। मेद और कफ से बगल, कन्धे, गर्दन, गले एवं जाँघों के मूल में छोटे-छोटे बेर जैसी अथवा बड़े बेर जैसी बहुत-सी गाँठें जो बहुत दिनों में धीरे-धीरे पकती हैं उन गाँठों की हारमाला को गंडमाला कहते हैं और ऐसी गाँठें कंठ पर होने से कंठमाला कही जाती है। 
        • क्रौंच के बीज को घिस कर दो तीन बार लेप करने तथा गोरखमुण्डी के पत्तों का आठ-आठ तोला रस रोज पीने से गण्डमाला (कंठमाला) में लाभ होता है। तथा कफवर्धक पदार्थ न खायें।

        Monday, February 13, 2017

        मांसपेशियों में खिंचाव,Home Remedies for Pulled Muscle in Hindi,


        Treatment Of Pulled Muscle‎ in Hindi,

        मांसपेशियों का दर्द या ऐंठन आमतौर पर पाई जाने वाली समस्याओं में से एक है। और यह एक से अधिक मांसपेशियों में हो सकता है। मांसपेशियों के दर्द में, ऊतक के लिगामेंट, टेंडोंस, फेशिया, और मांसपेशियों के संपर्क में आनेवाले कोमल ऊतकों और हड्डियों में दर्द हो सकता है।

        कभी काम करते-करते, दिनचर्या में भाग दौड़, कभी खेलते या दौड़ते में और कभी यूं ही सामान्य अवस्था में अचानक मांसपेशियों में खिंचाव आ जाता है। इस खिंचाव को हल्के में न लें यह एक बड़ी समस्या भी बन सकती है अधिक व्यायाम करने से भी मांसपेशियों में दर्द हो जाता है। इस स्थिति में हमारे शरीर को अधिक ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है। इस अधिक ऑक्सीजन की आवश्यकता की पूर्ति करने के लिए मांसपेशियों में अवायुश्वसन होता है जिसके कारण लेक्टिक एसिड एकत्रित होने लगता है। इस लेक्टिक एसिड के कारण मांसपेशियों में थकान और दर्द होता है।

        मांसपेशियों में खिंचाव आने के कारण 

        • अनियमित जीवन शैली और गलत खान-पान इस बीमारी का सबसे बड़ा कारण है. शरीर को पर्याप्त मात्रा में कैल्शियम नहीं मिलने से हड्डियां कमजोर हो जाती हैं. अधिक वजन होने से भी कमर, घुटने में दर्द जैसी समस्या होती है. 
        • पेट बढ़ने से रीढ़ पर तनाव बढ़ता है, जिससे कमर दर्द शुरू हो जाता है. अचानक झुकने, वजन उठाने, झटका लगने, गलत तरीके से उठने-बैठने और सोने, व्यायाम न करने से भी कमर दर्द या मांसपेशियों का दर्द हो सकता है. 
        • ऊबड़-खाबड़ रास्तों में तेज ड्राइविंग से भी रीढ़ की डिस्क प्रभावित हो सकती है. कठोर श्रम या चोट हो सकता है कारण मांसपेशियों में दर्द पूरे शरीर की स्थिति का संकेत हो सकता है. 
        • शारीरिक परिश्रम या कठोर श्रम के कारण तनाव, थकान या मांसपेशियों में चोट, इन्फ्लूएंजा, लाइम डिजीज, मलेरिया, डेंगू, मांसपेशी का फोड़ा तथा संक्रमण की वजह से भी दर्द हो सकता है. इलेक्ट्रोलाइट का असंतुलन जैसे-पोटैशियम या कैल्शियम की मात्रा बहुत कम होना भी इसका कारण हो सकता है.

        मांसपेशियों में खिंचाव आने के लक्षण:

        जब मसल्स का खिचांव होता है तो तेज दर्द के साथ कुछ अन्य लक्षण भी है जोे आज हम आपको बता रहे है।
        • यदि किसी खुली चोट की वजह से मसल्स फटी या टूटी हैं तो खुला घाव नजर आना।
        • जहा दर्द हो रहा हो उस जगह पर सूजन।
        • चलने-फिरने में भी कठिनाई आना और दर्द होना।
        • बेचैन करने वाला दर्द और आराम करने पर भी दर्द का बने रहना।
        • प्रभावित स्थान पर त्वचा के रंग का बदल जाना व अकड़न महसूस होना।
        • कमजोरी महसूस होना।

        मांसपेशियों में खिंचाव आने पर प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार

        • मांसपेशियों में खिंचाव आने पर रोगी व्यक्ति को पूरी तरह से आराम करना चाहिए।
        • रोगी को अपनी मांसपेशियों पर हर 2 घण्टे के अन्तराल पर आधे घण्टे के लिए बर्फ से मालिश करनी चाहिए।
        • मांसपेशियों में खिंचाव से पीड़ित रोगी को गर्म तथा ठंडा स्नान करना चाहिए।
        • मांसपेशियों में खिंचाव से पीड़ित रोगी को विटामिन `सी´ की मात्रा वाली चीजों का भोजन में अधिक सेवन करना चाहिए।
        • जडी बूटियाँ और लेप कुछ जडी बूटियों में एंटी इम्फ्लेमेट्री (प्रदाहनाशी) और आरामदायक गुण होते हैं। जबकि हर्बल लेप (जडी बूटियों के अर्क का अर्द्ध ठोस रूप जो लोशन, जेल या बामके रूप में होता है) त्वचा तथा ऊतकों में अंदर तक प्रवेश करते हैं तथा आराम पहुंचाते हैं।
        • मांसपेशियों में खिंचाव आने पर तेल से शरीर की मालिश करनी चाहिए जिसके फलस्वरूप दर्द जल्दी ही ठीक हो जाता है।
        • प्रभावित स्थान पर बर्फ लगाने से सूजन, ब्लीडिंग और दर्द में आराम मिलता है। मांसपेशियों में खिंचाव आने के बाद जितनी जल्दी आप बर्फ लगा सकते हैं, लगा लें। आप कितनी भी बार बर्फ लगा सकते हैं। बस ये ध्यान में रखें कि जब भी बर्फ लगाएं, 15 मिनट से ज्यादा देर के लिए न लगाएं।
        • तेल से मालिश मालिश से मांसपेशियों में रक्त परिसंचरण बढ़ता है जिससे मांसपेशियों को गर्मी मिलती है तथा यह लेक्टिक एसिड को दूर करता है जबकि तेल मांसपेशियों को आराम पहुंचाता है और दर्द से राहत दिलाता है। विभिन्न प्रकार के तेल जैसे पाइन, लैवेंडर, अदरक और पिपरमेंट का तेल मांस पेशियों के दर्द को कम करने में सहायक होते हैं।
        • एप्सम सॉल्ट (Epsom salt) गर्म पानी की एक बाल्टी में या टब में एक कप एप्सम नमक डाल कर प्रभावित स्थान को इस पानी में तकरीबन 15 मिनट के लिए डुबा कर रखें। एक हफ्ते में इस प्रक्रिया को दो से तीन बार कर सकते हैं। लेकिन हृदय से संबंधित, शुगर या उच्च रक्तचाप (high blood pressure) की समस्या से पीड़ित व्यक्ति इस विधि को न करें।
        • गर्म और ठंडा सेक (Hot and cold fomentation) गर्म पानी से नहाने से मांसपेशियों की सिकाई होती है और उन्हें आराम भी मिलता है। इस तरह से मांसपेशियों की अकड़न भी दूर होती है। लेकिन इसके उलट यदि सूजन महसूस हो रही हो तो बर्फ के टुकड़ों को पतले कपड़े में लपेटकर उससे सिकाई करनी चाहिए।
        • मैग्नीशियम युक्त खाना (Magnesium rich food) मैग्नीशियम की कम मात्रा से भी मांसपेशियों में दर्द और खिंचाव हो सकता है। इसके लिए खाने में कद्दू के बीज (pumpkin seeds), काली बीन्स (black beans), सूरजमुखी के बीज (sunflower seeds), बादाम और काजू को अपने आहार में शामिल करना चाहिए। जिससे शरीर को प्रचुर मात्रा में मैग्नीशियम मिल सके।
        • सेब का सिरका (Apple cider vinegar) सेब के सिरके की कुछ मात्रा एक गिलास पानी में मिलाकर पीने से मसल्स के दर्द से राहत मिलती है। इसके अलावा यदि इस तरह पीना कठिन लगे तो एक गिलास पानी में दो चम्मच सिरका, एक चम्मच शहद और कुछ पत्तियां पुदीने की मिलाकर भी पी जा सकती हैं।
        • ऑयल (Oil) मसल पेन में राहत के लिए कैमोमाइल, पेपरमिंट, लेवेंडर आदि तेल में एक या दो चम्मच, नारियल या ऑलिव ऑयल मिलाकर प्रभावित स्थान पर लगाना चाहिए।
        • चेरी जूस (Cherry juice) मसल पेन से राहत के लिए चेरी जूस भी पीना चाहिए। चेरी जूस पीने से मसल्स का खिंचाव कम होता है साथ ही यह मांसपेशियों को राहत भी देता है।
        • मसाज (Massage) मसाज करने से शरीर का रक्तसंचार बेहतर होता है जो कि दर्द को तेजी से ठीक करने में मदद करता है। यदि मसाज करने के लिए अच्छे तेलों का प्रयोग किया जाए तो असर दोगुना हो जाता है।
        • मिर्च में मौजूद कैप्सेसिन (capsaicin) भी दर्द की खास दवा है। बाजार में मिर्च से तैयार कई तरह की दर्द निवारक क्रीम मिलती हैं, लेकिन इन्हें आप घर भी तैयार कर सकते हैं। इसके लिए नारियल या जैतून के तेल को गरम करके इसमें एक बड़ा चम्मच लाल मिर्च मिलाकर इसे ठंडा करें। इसके बाद इसमें एलोवेरा जेल मिलाएं। इस तरह से तैयार उत्पाद को यदि प्रभावित स्थान पर लगाकर हल्के हाथ से मालिश की जाए तो बेहद आराम मिलता है।
        • आराम (Rest) कई बार कुछ न करके सिर्फ आराम करना भी शरीर को बहुत लाभ दे सकता है। यदि शरीर में अकड़न महसूस हो तो कम से कम दो दिन आपको शरीर को पूरी तरह आराम देना चाहिए। इससे शरीर हल्का महसूस करता है और तनाव कम होता है जिसका सीधा असर मांसपेशियों पर भी पड़ता है।

        गला बैठना और उसका इलाज,Home Remedies for Hoarseness In Hindi,

        इस रोग में रोगी का गला बैठ जाता है जिसके कारण रोगी को बोलने में परेशानी होने लगती है तथा जब व्यक्ति बोलता है तो उसकी आवाज साफ नहीं निकलती है तथा उसकी आवाज बैठी-बैठी सी लगती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि स्वर नली के स्नायुओं पर किसी प्रकार के अनावश्यक दबाव पड़ने के कारण वे निर्बल पड़ जाती हैं। इस रोग के कारण रोगी की आवाज भारी होने लगती है तथा गले में खुश्की हो जाती है और कभी-कभी रोगी को सूखी खांसी और सांस लेने में परेशानी होने लगती है।

        गला बैठने के कारण :- Causes

        • अधिक गाना गाने, चीखने-चिल्लाने तथा जोर-जोर से भाषण देने से रोगी का गला बैठ जाता है।
        • ठंड लगने तथा सीलनयुक्त स्थान पर रहने के कारण गला बैठ सकता है।
        • ठंडी चीजों का भोजन में अधिक प्रयोग करने के कारण भी यह रोग सकता है।
        • शरीर के अन्दर किसी तरह का दूषित द्रव्य जमा हो जाने पर जब यह दूषित द्रव्य किसी तरह से हलक तक पहुंच जाता है तो गला बैठ जाता है।

        गला बैठने का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार ,गला बैठने पर क्या करें,

        • गला बैठने के रोग का उपचार करने के लिए सबसे पहले रोगी व्यक्ति को अपने पेड़ू पर गीली मिट्टी की पट्टी से लेप करना चाहिए तथा इसके बाद एनिमा क्रिया का प्रयोग करके पेट को साफ करना चाहिए। 
        • गला बैठने के रोग से पीड़ित रोगी को सुबह तथा शाम के समय में अपने गले के चारों तरफ गीले कपड़े या मिट्टी की गीली पट्टी का लेप करना चाहिए। 
        • काली मिर्च - यदि सर्दी जुखाम के कारण आपका गला बैठ गया है तो रोजाना सोने से पहले तीन से चार काली मिर्च और उतनी ही मात्र में मिश्री को एक साथ चबाने से बैठ गला खुल जाता है |
        • हल्दी - यदि tonsil के कारण आपका गला बैठ गया है तो एक गिलास गर्म दूध में एक चमच हल्दी पाउडर मिलाकर सोने से पहले पीने से tonsil एक से दो दिन में ठीक हो जाता है जिस कारण बैठा हुआ गला भी खुल जाता है |
        • रोगी व्यक्ति को अपने गले, छाती तथा कंधे पर बारी-बारी से गर्म या ठंडा सेंक करना चाहिए तथा इसके दूसरे दिन उष्णपाद स्नान (गर्म पानी से पैरों को धोना) करना चाहिए। 
        • रोगी व्यक्ति को गर्म पानी में हल्का सा नमक मिलाकर उस पानी से गरारे करने चाहिए और सुबह तथा शाम के समय में एक-एक गिलास नमक मिला हुआ गर्म पानी पीना चाहिए। 
        • गला बैठना रोग से पीड़ित रोगी को 1 सप्ताह तक चोकरयुक्त रोटी तथा उबली-सब्जी खानी चाहिए। 
        • इस रोग से पीड़ित रोगी को फल और दूध का अधिक सेवन करना चाहिए जिसके फलस्वरूप यह रोग ठीक हो जाता है। 
        • रोगी व्यक्ति को पानी में नींबू का रस मिलाकर दिन में कई बार पीना चाहिए तथा इसके अलावा गहरी नीली बोतल का सूर्यतप्त जल कम से कम 25 मिलीलीटर की मात्रा में दिन में 6 बार पीना चाहिए। इस प्रकार से प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार करने से यह रोग ठीक हो जाता है।
        • गले के रोगों को ठीक करने के लिए सबसे पहले रोगी व्यक्ति को 1-2 दिन फलों के रस को पीकर उपवास रखना चाहिए।
        • अनन्नास, सेब, अंजीर, शहतूत, मेथी, लहसुन तथा पपीता का सेवन अधिक करने से गले के कई प्रकार के रोग ठीक हो जाते हैं।
        • अंगूर का रस पीने से गला बैठने का रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।
        • यदि गले में खराश हो तो तुलसी और अदरक का रस शहद में मिलाकर चाटने से लाभ होता है।
        • यदि गला बैठा हो या सूज रहा हो तो पानी में नींबू निचोड़कर गरारा करने से बहुत अधिक लाभ मिलता है।
        • फिटकिरी - यदि किसी कारण वश आपके गले में सुजन आ गई हो और उस कारण आपका गला बैठ गया हो तो एक गिलास पानी ले और उसमे 50 ग्राम फिटकिरी को डाल कर दिन में दो से तीन बार गारगल करे | ऐसा करने से गले की खराश दूर हो जाती है और आपके गले को आराम मिलती है | इस प्रक्रिया को दो से तीन दिन करने से आपकी गले की सुजन कम हो जाता है और बैठा हुआ गला ठीक हो जाएगा |
        • चुना - गला बैठने पर सोने से पहले चुने का लेप बना ले और इसे सोने से पहले गले पर लगाए जिससे सुबह तक बैठा गला ठीक हो जाता है
        • मेथी के दानों को पानी में उबाल कर उस पानी से गरारा करने से मुंह के छाले जल्दी ठीक हो जाते हैं।
        • गले के रोगों को ठीक करने के लिए मिट्टी की गर्म पट्टी गले के चारों तरफ लगाकर उपवास रखने तथा एनिमा लेने से बहुत अधिक लाभ मिलता है।
        • यदि भोजन को निगलते समय दर्द हो रहा हो तो सूर्यतप्त नीली बोतल के पानी से गरारा करने से भी रोगी को लाभ होता है।
        • गले के रोग को ठीक करने के लिए गले पर गर्म या ठंडा सेंक करना चाहिए। इसके फलस्वरूप रोगी को बहुत अधिक फायदा मिलता है।
        • गले में दर्द होने पर तुलसी का रस शहद में मिलाकर चाटने से गले में दर्द होना बंद हो जाता है।
        • अंजीर को पानी में उबालकर उस पानी से गरारा करने से गला बैठने का रोग ठीक हो जाता है।
        • त्रिफला का चूर्ण फांककर दूध में मिलाकर पीने से गले के कई रोग ठीक हो जाते हैं।
        • यदि गले में कोई रोग हो जाए तो अंगूठे और तर्जनी उंगली के भाग पर मालिश करने से गले का रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।
        • एक गिलास पानी में आधा चम्मच चाय की पत्ती उबालकर उस पानी से गरारा करने से रोगी व्यक्ति को बहुत अधिक लाभ मिलता है। इस क्रिया को दिन में 3-4 बार करने से यह रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है। इस प्रकार से उपचार करने से गले में दर्द तथा सूजन भी ठीक हो जाती है।
        • एक चम्मच लहसुन के रस को एक गिलास पानी में डालकर उस पानी को उबाल लें। इस पानी से दिन में 3-4 बार गरारा करने से गले के रोगों में बहुत अधिक लाभ मिलता है।
        • गले के रोगों को ठीक करने के लिए कई प्रकार के आसन भी हैं जिन्हें करने से गले के रोग ठीक हो जाते हैं ये आसन इस प्रकार हैं- सूर्य नमस्कार तथा सिंहासन। 

        Saturday, February 11, 2017

        हाथ और पैर में झुनझुनी,Home Remedies for Numb Hands and Feet In Hindi,

        हाथ और पैर में झुनझुनी,Home Remedies for Numb Hands and Feet In Hindi,
        शरीर का कोई अंग यदि किसी दबाव में ज्यादा समय तक रहता है,तो वह सुन्न हो जाता है.वस्तुतः यह दबाव हाथ या पैर की नसों पर पड़ता है, ये नसें कई एक कोशीय फाइबर से बनी होती है. प्रत्येक एक कोशीय फाइबर अलग-अलग संवेदनाओं को मस्तिष्क तक पहुँचाने का कार्य करता है.इन फाइबरों की मोटाई भी कम-ज्यादा होती है.इसका कारण माइलिन नामक श्वेत रंग के पदार्थ द्वारा बनाई गई झिल्ली है.इन पर दबाव पड़ने से मस्तिस्क तक नसों द्वारा पर्याप्त मात्रा में आक्सीजन और रक्त का संचरण नहीं हो पता है. मस्तिष्क तक उस अंग के बारे में पहुंचने वाली जानकारी रक्त और आक्सीजन के अभाव में अवरूद्ध हो जाती है.इस कारण वहां संवेदना महसूस नहीं हो पाती और वह अंग सुन्न हो जाता है.

        जब उस अंग पर से दबाव हट जाता है तब रक्त और आक्सीजन का संचरण नियमित हो जाता है और पुनः उस अंग में संवेदनशीलता लौट आती है.

        हाथ और पैर में झुनझुनी के लक्षण 

        इस रोग में रक्त धमनियों की भीतरी दीवारों पर वसा जम जाती है। ये हाथ-पांवों के ऊतकों में रक्त प्रवाह को रोकता है। इस रोग के प्राथमिक चरण में चलने या सीढ़ियां चढ़ने पर पैरों और कूल्हों थकाना या दर्द महसूस होता है। अन्य लक्षण होते हैं दर्द, सुन्न होना, पैर की पेशियों में भारीपन। शारीरिक काम करते समय मांसपेशियों को अधिक रक्त प्रवाह चाहिए होता है। 

        मधुमेह या डायबिटीज मेलीटस :यदि आपको मधुमेह है तो रक्त में शर्करा की मात्रा को नियंत्रण में रखें,क्या है 
        यह बीमारी उन लोगों में ज्यादा होती है, जो हाइपरटेंशन, डायबिटीज, उच्च रक्तचाप, हाईकॉलेस्ट्रॉल के मरीज होते हैं या उनके खून में फैट या लिपिड की मात्रा ज्यादा होती है। साथ ही धूम्रपान ज्यादा करने वालों को भी ये समस्या होती है। इसके अलावा, खून का थक्का जमने के कारण रक्त-शिराएं ब्लॉक हो जाती हैं। 

        हाथ और पैर में झुनझुनी का घरेलू उपचार ,

        गर्म पानी का सेंक

        गर्म पानी का सेंक-सबसे पहले प्रभावित जगह पर गर्म पानी की बोतल से सेंक रखें। इससे वहां की ब्लड सप्लाई बढ़ जाएगी। इससे मासपेशियां और नसें रिलेक्स होंगी। एक साफ कपड़े को गर्म पानी में 5 मिनट के लिए भिगोएं और फिर उससे प्रभावित जगह को सेंकें। आप चाहें तो गर्म पानी से स्नान भी कर सकती हैं।

        गर्म तेल से करें मसाज

        हाथ पैरों के सुन्न पड़ने पर आप जैतून या फिर सरसों के तेल को हल्का गर्म करके उससे हाथ पैरों की मालिश करें. ऐसा करने से सुन्न पड़े अंगों की नसें खुलती हैं और प्रभावित हिस्से में ब्लड सर्कुलेशन बढ़ता है.  प्रभावित अंगों के मसाज से आप अपनी इस परेशानी से काफी हद तक राहत पा सकते हैं.

        प्रभावित जगह पर मसाज करे।

        हाथ या पैर में सुन्‍नपन आने पर मसाज इस समस्‍या से निपटने का सबसे आसान और सरल तरीका है। यह ब्‍लड सर्कुलेशन को बढ़ाता है, जिससे सुन्नता में कमी आती है। इसके अलावा यह मसल्‍स और नसों को प्रोत्‍साहित कर, समग्र कामकाज में सुधार करता है। अपने हाथों में गर्म जैतून, नारियल या सरसों के तेल लेकर इसे सुन्न हिस्‍से में लगाकर 5 मिनट के लिए सर्कुलर मोशन में अपनी उंगालियों से मसाज करें। जरूरत पड़ने पर इस उपाय को दोहराये।

        एक्सरसाइज करें-

        व्यायाम करने से शरीर में ब्लड र्स्कुलेशन होता है और वहां पर आक्सीजन की मात्रा बढ़ती है। रोजाना हाथ और पैरों का 15 मिनट व्यायाम करना चाहिए। इसके अलावा हफ्ते में 5 दिन के लिए 30 मिनट एरोबिक्स करें, जिससे आप हमेशा स्वस्थ बने रहें।एक्सरसाइज शरीर के विभिन्न अंगों में ब्लड सर्कुलेशन और ऑक्सीजन में सुधार करता है, जिससे हाथ और पैर सहित शरीर के किसी भी अंग में सुन्नपन, झनझनाहट को रोकने में मदद मिलती है। इसके अलावा नियमित रूप एक्सरसाइज गतिशीलता में सुधार और कई स्वास्थ्य समस्याओं से बचाता है।

        मैग्नी शियम का सेवन जरूर करें

        हरी पत्तेीदार सब्जिेयां, मेवे, बीज, ओटमील, पीनट बटर, ठंडे पानी की मछलियां, सोया बीन, अवाकाडो, केला, डार्क चॉकलेट और लो फैट दही आदि जरूर खाएं। आप रोजाना मैग्नीlशियम 350 एम जी की सपलीमेंट भी ले सकते हैं।

        हल्दी का उपयोग 

        हल्दी-हल्दी में मौजूद कुरकुर्मीन नाम का तत्व पूरे शरीर में ब्लड सर्कुलेशन में सुधार करने में मदद करता है। इसके अलावा, इसमें मौजूद एंटी-इंफ्लेमेंटरी गुण प्रभावित हिस्से में दर्द और परेशानी कम करने में मदद करता है। समस्या होने पर एक गिलास दूध में आधा चम्मच हल्दी मिक्स करके हल्की आंच पर पकाएं। फिर इसमें थोड़ा सा शहद मिलाकर दिन में एक बार पीने से ब्लड सर्कुलेशन में सुधार होता है। आप हल्दी और पानी से बने पेस्ट से प्रभावित हिस्से पर मसाज भी कर सकते हैं।

        खूब खाएं Vitamin B फूड

        अगर हाथ-पैरों में जन्न-जन्नाशहट सी होती है तो अपने आहार में ढेर सारे विटामिन बी, बी6 और बी12 को शामिल करें। इनके कमी से भी हाथ, पैरों, बाजुओं और उंगलियों में सुन्न पैदा हो जाती है। आपको अपने आहार में अंडे, अवाकाडो, मीट, केला, बींस, मछली, ओटमील, दूध, चीज़, दही, मेवे, बीज और फल शामिल करने चाहिये।

        दालचीनी का उपयोग

        दालचीनी का उपयोग करें-दालचीनी में केमिकल और न्यूट्रिएंट्स होते हैं जो हाथ और पैरों में ब्लड फ्लो को बढ़ाते हैं। एक्सपर्ट बताते हैं रोजाना 2-4 ग्राम दालचीनी पाउडर को लेने से ब्लड सर्कुलेशन बढ़ता है। इसको लेने का अच्छा तरीका है कि एक गिलास गर्म पानी में 1 चम्मच दालचीनी पाउडर मिलाएं और दिन में एक बार पिएं। दूसरा तरीका है कि 1 चम्मच दालचीनी और शहद मिला कर सुबह कुछ दिनों तक सेवन करें।

        औषिधि के रूप में सिर्फ "" नवायस लौह वटी "" २ -२ गोली दूध के साथ सुबह शाम सेवन करे

        Monday, November 07, 2016

        पेट में दर्द का घरेलू इलाज,Home Remedies for Stomach Pain in Hindi,Pet Dard ke Gharelu Upay

        पेट में दर्द होना एक आम समस्या है ,जिससे लगभग सभी व्यक्तियों को जीवन में बार बार सामना करना पड़ता है | इनके कई अलग अलग काऱण हो सकते है । पेट दर्द के मुख्य कारण कब्ज का होना, ज्यादा गैस बनना, अपच, विषाक्त भोजन सेवन करना आदि सकता हैं।यहाँ पर हम कुछ आसान से उपाय बता रहे है जिसको करके आप पेट दर्द में आराम प्राप्त कर सकते है ।

        पेट दर्द के कारण | Causes of Stomach Pain in Hindi | Pet Dard ke Karan

        • पेट में कब्ज की समस्या होने पर
        • भोजन का ठीक से न पचना
        • अनियमित खानपान
        • जंक फ़ूड का अधिक सेवन
        • एसिडिटी होने पर
        • पेट में अत्यधिक गैस बनने पर

        पेट में दर्द का घरेलू इलाज,Home Remedies for Stomach Pain in Hindi

        • पेट दर्द मे हींग बहुत ही लाभकारी है। 5 ग्राम हींग थोडे पानी में पीसकर पेस्ट बनाएं। इसे नाभी पर और उसके आस पास लगायें फिर क़ुछ देर लेटे रहें। इससे पेट की गैस निकल जायेगी और दर्द में राहत मिलेगी
        • जीरा पेट दर्द मे बहुत हि लाभदायक है । जीरा को तवे पर भून ले । 2-3 ग्राम की मात्रा गरम पानी के साथ दिन मे 3-4 बार लें या वैसे ही चबाकर खाये शीघ्र लाभ प्राप्त होता है।
        • 10 ग्राम तुलसी का रस पीने से पेट की मरोड़ व दर्द जल्दी ही ठीक होता है।
        • त्रिफला का 100 ग्राम चूर्ण में 75 ग्राम चीनी मिलालें इस चुर्ण का 5 ग्राम की मात्रा में दिन में 2 -3 बार
        • पानी के साथ सेवन करें। इससे पेट की सभी बीमारियां समाप्त होती हैं।
        • सूखा अदरक को मुहं मे चूसने से पेट दर्द में तुरन्त राहत मिलती है।
        • पेट दर्द में पानी में थोडा सा मीठा सोडा डालकर पीने से फ़ायदा होता है।
        • बिना दूध की चाय पीने से भी पेट दर्द में आराम मेहसूस होता हैं।
        • अजवाईन तवे पर भून लें। इसको काला नमक के साथ मिलाकर 2-3 ग्राम गरम पानी के साथ दिन में 3 बार लेने से पेट के दर्द में शीघ्र आराम मिलता है।
        • एक चम्मच अदरक के रस में 2 चम्मच नींबू का रस और थोडी सी चीनी मिलाकर दिन मे 3 बार लेने से भी पेट दर्द में आराम मिलता है।
        • किसी भी पेट दर्द में केला खाना लाभकारी होता है। केला एक पोषक आहार होता है। केले का सेवन से पेट दर्द में शीघ्र आराम मिलता है। नींबू के रस में काला नमक, जीरा, अजवायन चूर्ण मिलाकर दिन में तीन चार बार लेने से पेट दर्द से आराम मिलता है।
        • हरा धनिया का रस एक चम्मच शुद्ध घी मे मिलाकर लेने से पेट के दर्द में शीघ्र आराम मिलता है।
        • अनार पेट दर्द मे बहुत लाभदायक माना गया है। अनार के बीज थोडी मात्रा में नमक और काली मिर्च के साथ दिन में दो तीन बार लें।
        • मूली की चटनी,अचार, सब्जी या मूली पर नमक, काली मिर्च डालकर खाने से पेट के सभी रोग दूर होते है।
        • चौलाई की सब्जी बनाकर खाने से पेट की सभी बीमारियां समाप्त होती है।
        • सौंठ का 1 चम्मच चूर्ण और सेंधा नमक को एक गिलास पानी में गर्म करके पीने से पेट दर्द खत्म हो जाता है। इसबगोल को दूध के साथ रात को सोते वक्त लेते रहने से पेट के दर्द में आराम मिलता है । प्याज को आग में गर्म करके रस निकाल लें और इस रस में नमक मिलाकर पीएं। इससे भी पेट का दर्द ठीक हो जाता है
        • दो चम्मच ग्राम सौंफ़ रात भर एक गिलास पानी में गलाएं इसे सुबह खाली पेट छानकर पीयें पेंट दर्द मे आराम मिलता है ।

        Friday, November 04, 2016

        वेरीकोस वेन्स.नसों का फूलना,Natural Treatment for Varicose Veins in Hindi

        जब यह रोग किसी व्यक्ति को हो जाता है तो उसके शरीर की शिराएं (नसें) फैलकर लंबी और मोटी हो जाती है। यह शिराएं (नसें) शरीर की किसी भाग की हो सकती है जैसे- मलाशय शिराएं, वृषण शिराएं तथा ग्रासनली शिराएं। लेकिन यह रोग अधिकतर पैरों को प्रभावित करता है जिसके कारण पैरों की शिराएं लंबी तथा मोटी हो जाती हैं। इस रोग का शिकार अधिकतर महिलाएं होती हैं और इस रोग में रोगी का दाहिना पैर, बाएं पैर की अपेक्षा अधिक प्रभावित होता है।
        वेरीकोज़ वेन अर्थात पैरों की पिण्ड़लियों के पीछे नसो का गुच्छा बन जाना, इससे निजात पाने का चमत्कारी घरेलु उपाय वेरीकोज़ वेन अर्थात पैरों की पिण्ड़लियों के पीछे नसो का गुच्छा बन जाना जो देखने में तो बहुत खराब लगता ही है साथ ही साथ रोगी को पैरों में खिंचाव और दर्द की भी अनूभूति देता है

        वेरिकोस वेन्स रोग होने का कारण 

        • ये शिराएं वह रक्त वाहिकाएं होती है जो रक्त (खून) को हृदय में वापस लाती हैं। इन शिराओं में वॉल्व लगे होते हैं, जिनसे रक्त का एक ही दिशा में संचारण होता है। जब ये शिराऐं फैल जाती है तो इसके वॉल्व अपना कार्य करना बंद कर देते हैं, 
        • जिसके कारण रक्त (खून) उपास्थि शिराओं में जमा होकर, टांग के ऊतकों के बीच में जमने लगता है, जिसके कारण उस भाग पर सूजन हो जाती है और आगे चलकर त्वचा के रंग में परिवर्तन होने लगता है। जिसके कारण रोगी व्यक्ति के शरीर में क्षय, एक्जीमा, खून की कमी आदि लक्षण दिखाई पड़ने लगते हैं।

        वेरिकोस वेन्स रोग का लक्षण

        • इस रोग के हो जाने पर रोगी व्यक्ति के पैरों में दर्द के साथ थकान तथा भारीपन महसूस होने लगता है
        • रोगी के टखने में सूजन हो जाती है। रात के समय में रोगी के पैरों में ऐंठन होने लगती है। 
        • इस रोग से पीड़ित रोगी की त्वचा का रंग बदलने लगता है। इस रोग के कारण स्टैटिस डर्मेटाइटिस तथा शरीर के नीचे के अंगों में सेल्युलाइटिस रोग हो जाता है।
        • शारीरिक श्रम की कमी
        • अचानक से शरीर में होने वाले हार्मोन परिवर्तन
        • उम्र का बढ़ना
        • आनुवांशिक
        • वेरिकोस वेन्स रोग उन व्यक्तियों को हो जाता है जो अधिक देर तक खड़े होकर या बैठकर काम करते हैं।
        • वरिकोस वेन्स रोग उन व्यक्तियों को भी हो जाता है तो अधिक वजन उठाने का कार्य करते हैं तथा अधिक वजन वाले व्यक्तियों और महिलाओं को भी वेरिकोस वेन्स रोग हो जाता है।

        वेरिकोस वेन्स रोग होने पर प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार

        • वेरिकोस वेन्स रोग से पीड़ित रोगी को अधिक वजन उठाने का कार्य नहीं करना चाहिए क्योंकि इससे इस रोग का प्रभाव और अधिक बढ़ सकता है।
        • यदि वेरिकोस वेन्स रोग से पीड़ित रोगी का वजन अधिक है तो उसे अपना वजन कम करना चाहिए ताकि यह रोग जल्दी ठीक हो सके।
        • रोगी व्यक्ति को लंबे समय तक बैठने तथा खड़े रहने का कार्य नहीं करना चाहिए क्योंकि इससे रोग का प्रभाव और बढ़ सकता है।
        • वेरिकोस वेन्स रोग से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए पानी में इप्सम नमक मिलाकर न्यूट्रल इमर्शन स्नान करना चाहिए। इससे रोगी व्यक्ति को बहुत अधिक आराम मिलता है।
        • रोग से रोग से प्रभावित भाग पर बारी-बारी से गर्म तथा ठण्डी सिंकाई करनी चाहिए ताकि दर्द तथा ऐंठन ठीक हो सके।
        • रोगी व्यक्ति को प्रतिदिन रात के समय में अपनी टांगों पर ठण्डे लपेट का इस्तेमाल करना चाहिए इसके फलस्वरूप यह रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।
        • यदि रोगी व्यक्ति को अल्सर रोग नहीं है तो उसे अपनी टांगों पर गीली मिट्टी का लेप करना चाहिए। इससे रोगी को बहुत अधिक लाभ मिलता है।
        • वेरिकोस वेन्स रोग से पीड़ित रोगी को कच्चे नारियल का पानी, धनिए का पानी ,जौ का पानी बिना नमक डाले पीना चाहिए। इस प्रकार से उपचार करने से शरीर में अतिरिक्त जल तत्व कम हो जाता है और वेरिकोस वेन्स रोग ठीक हो जाता है।
        • इस रोग से पीड़ित रोगी को सुबह तथा शाम कुछ ऐसे व्यायाम करने चाहिए जिसमें टांग को मोड़ा जा सके तथा सिकुड़ा जा सके। इस प्रकार के व्यायाम से शिराओं में रुका रक्त आगे बढ़ने लगता है और वेरिकोस वेन्स रोग ठीक हो जाता है
        • यदि वेरिकोस वेन्स रोग से पीड़ित रोगी प्रतिदिन प्राकृतिक चिकित्सा से अपने रोग का उपचार करे तो उसका यह रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।
        आवश्यक सामग्री
        • आधा कप एलोवेरा का गूदा
        • आधा कप कटी हुयी गाजर
        • 10 मि०ली० सेब का सिरका
        बनाने विधी 
        मिक्सी में उपरोक्त तीनों सामानों को एकसाथ ड़ालकर अच्छे से पीसकर पेस्ट तैयार कर लें।
        प्रयोग विधी 
        वेरीकोज वेन वाले हिस्से पर इस पेस्ट को फैलाकर, सूती कपड़े से बहुत ही हल्की पट्टी बाँध दें । अब एक सीधी जगह पर पीठ के बल लेट जायें और पैरों को शरीर के तल से लगभग एक-सवा फुट ऊपर उठाकर किसी सहारे से टिका लें । इस अवस्था में लगभग तीस मिनट तक लेटे रहें । यह प्रयोग रोज तीन बार करना है ।
        ध्यान रखें यह बहुत धीरे ठीक होने वाला रोग है अत: सयंम के साथ इस प्रयोग का पालन करें 

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