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Monday, August 12, 2019

साईटिका का उपचार-Home Remedies for Sciatica in Hindi


How to Cure Sciatica


साईटिका में होने वाला दर्द, स्याटिक नर्व के कारण होता है। यह दर्द सामान्यत: पैर के निचले हिस्से की तरफ फैलता है। ऐसा दर्द स्याटिक नर्व में किसी प्रकार के दबाव, सूजन या क्षति के कारण उत्पन्न होता है। इसमें चलने-उठने-बैठने तक में बहुत तकलीफ होती है। यह दर्द अकसर लोगों में 30 से 50 वर्ष की उम्र में होता है

साईटिका रोग होने का कारण:-

  • जब किसी व्यक्ति की रीढ़ की हड्डी में चोट लग जाती है तो उसे यह रोग हो जाता है।
  • यदि साईटिका नाड़ी के पास विजातीय द्रव (दूषित द्रव) जमा हो जाता है तो नाड़ी दब जाती है जिसके कारण साईटिका रोग हो जाता है। 
  • रीढ़ की हड्डी के निचले भाग में आर्थराइटिस रोग हो जाने के कारण भी यह रोग हो सकता है।
  • असंतुलित भोजन का सेवन करने तथा गलत तरीके के खान-पान से भी यह रोग हो जाता है।
  • रात के समय में अधिक जागने के कारण भी यह रोग हो सकता है।
  • अधिक समय तक एक ही अवस्था में बैठने या खड़े रहने के कारण भी यह रोग हो सकता है।
  • अपनी कार्य करने की क्षमता से अधिक परिश्रम करने के कारण या अधिक सहवास करने के कारण भी यह रोग हो सकता है। 

साईटिका का लक्षण

कमर के निचले हिस्से मेँ दर्द के साथ जाँघ व टांग के पिछले हिस्से मेँ दर्द। पैरोँ मेँ सुन्नपन के साथ मांसपेशियोँ मेँ कमजोरी का अनुभव। पंजोँ मेँ सुन्नपन व झनझनाहट। पैदल चलने में परेशानी।
सर्जरी या वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति से हो सकती है। साईटिका नर्व (नाड़ी) शरीर की सबसे लंबी नर्व होती है। यह नर्व कमर की हड्डी से गुजरकर जांघ के पिछले भाग से होती हुई पैरोँ के पिछले हिस्से मेँ जाती है। जब दर्द इसके रास्ते से होकर गुजरता है, तब ही यह साईटिका का दर्द कहलाता है।

साईटिका का उपचार-Best Treatment for Sciatica at home,How to Cure Sciatica

  • आलू का रस 300 ग्राम नित्य २ माह तक पीने से साईटिका रोग नियंत्रित होता है। इस उपचार का प्रभाव बढाने के लिये आलू के रस मे गाजर का रस भी मिश्रित करना चाहिये।
  • लहसुन की खीर इस रोग के निवारण में महत्वपूर्ण है। 100 ग्राम दूध में 4-5 लहसुन की कली चाकू से बारीक काटकर डालें। इसे उबालकर ठंडी करके पीलें। यह विधान 2-3 माह तक जारी रखने से साईटिका रोग को उखाड फ़ैंकने में भरपूर मदद मिलती है। 
  • लहसुन में एन्टी ओक्सीडेन्ट तत्व होते हैं जो शरीर को स्वस्थ रखने हेतु मददगार होते है । हरे पत्तेदार सब्जियों का भरपूर उपयोग करना चाहिये। कच्चे लहसुन का उपयोग साईटिका रोग में अत्यंत गुणकारी है। सुबह शाम 2-3 लहसुन की कली पानी के साथ निगलने से भी फायदा होता है। हरी मटर, पालक, कलौंजी, केला, सूखे मेवे ज्यादा इस्तेमाल करें। 
  • साईटिका रोग को ठीक करने में नींबू का अपना महत्व है। रोजाना नींबू के रस में दो चम्मच शहद मिलाकर पीने से आशातीत लाभ होता है। 
  • सरसों के तेल में लहसुन पकालें। दर्द की जगह इस तेल की मालिश करने से तुरंत आराम लग जाता है।
  • लौह भस्म 20 ग्राम+विष्तिंदुक वटी 10 ग्राम+रस सिंदूर 20 ग्राम+त्रिकटु चूर्ण 20 ग्राम इन सबको अदरक के रस के साथ घोंटकर 250 गोलियां बनालें। दो-दो गोली पानी के साथ दिन में तीन बार लेते रहने से साईटिका रोग जड़ से समाप्त हो जाता है। 
  • प्रतिदिन सामान्य व्यायाम करेँ। वजन नियंत्रण मेँ रखेँ। पौष्टिक आहार ग्रहण करेँ। रीढ़ की हड्डी को चलने-फिरने और उठते-बैठते समय सीधा रखेँ। भारी वजन न उठाएं।
  •  रोगी को प्रतिदिन अपने पैरों पर सरसों के तेल से नीचे से ऊपर की ओर मालिश करनी चाहिए। इससे यह रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है। 
  • 5 कालीमिर्चों को तवे पर सेंककर कर सुबह के समय में खाली पेट मक्खन के साथ सेवन करना चाहिए। इस प्रयोग को प्रतिदिन करने से यह रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।
  • करेला, लौकी, टिण्डे, पालक, बथुआ तथा हरी मेथी का अधिक सेवन करने से साईटिका रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है। 
  • इस रोग से पीड़ित रोगी को पपीते तथा अंगूर का अधिक सेवन करना चाहिए। इससे यह रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।
  • सूखे मेवों में किशमिश, अखरोट, अंजीर, मुनक्का का सेवन करने से भी यह रोग कुछ दिनों में ठीक हो जाता है। 
  • फलों का रस दिन में 3 बार तथा आंवला का रस शहद के साथ मिलाकर पीने से साईटिका रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है। 
  • इस रोग को ठीक करने के लिए रोगी व्यक्ति को सबसे पहले एनिमा क्रिया करके अपने पेट को साफ करना चाहिए। इसके बाद रोगी को अपने पैरों पर मिट्टी की पट्टी का लेप करना चाहिए। इसके बाद रोगी को कटिस्नान करना चाहिए और फिर इसके बाद मेहनस्नान करना चाहिए। इसके बाद कुछ समय के लिए पैरों पर गर्म सिंकाई करनी चाहिए और गर्म पाद स्नान करना चाहिए। इस प्रकार से उपचार करने से साईटिका रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है। 
  • सुबह के समय में सूर्यस्नान करने तथा इसके बाद पैरों पर तेल से मालिश करने और कुछ समय के बाद रीढ़ स्नान करने तथा शरीर पर गीली चादर लपेटने से साईटिका रोग ठीक हो जाता है।
    सूर्यतप्त लाल रंग की बोतल के तेल की मालिश करने से तथा नारंगी रंग की बोतल का पानी कुछ दिनों तक पीने से साईटिका रोग ठीक हो जाता है। 
  • तुलसी के पत्तों को पीसकर पानी में मिलाकर प्रतिदिन सेवन करने से यह रोग ठीक हो जाता है।
    हार-सिंगार के पत्तों का काढ़ा सुबह के समय में प्रतिदिन खाली पेट पीने से साईटिका रोग ठीक हो जाता है 

Monday, July 15, 2019

फाइलेरिया के कारण लक्षण और उसके घरेलू उपाय,What is Filaria in Hindi,

फाईलेरिया रोग का इलाज संभव है। अगर इसका इलाज प्रारंम्भिक अवस्था में हो जाय तो संक्रमण को फैलने से रोका जा सकता है। फाइलेरिया रोग में अकसर हाथ या पैर बहुत ही ज़्यादा सूज जाते हैं। इसलिए इस रोग को हाथी पांव भी कहते हैं। पर फाइलेरिया रोग से पीड़ित हर व्यक्ति के हाथ या पैर नहीं सूजते। यह बीमारी पूर्वी भारत, मालाबार और महाराष्ट्र के पूर्वी इलाकों में बहुत अधिक फैली हुई है।
  • यह कृमिवाली बीमारी है। यह कृमि लसिका तंत्र की नलियों में होते हैं और उन्हें बंद कर देते हैं। क्यूलैक्स मच्छर के काटने से बहुत छोटे आकार के कृमि शरीर में प्रवेश करते हैं। मलेरिया के कीड़ों की तरह यह कीड़े मनुष्यों और मच्छरों दोनों में छूत पैदा करते हैं फाइलेरिया (Lymphatic Filariasis) एक परजीवीजन्य संक्रामक बीमारी है जो धागे जैसे कृमियों से होती है। वैश्विक स्तर पर इसे एक उपेक्षित उष्णकटिबंधीय बीमारी (Neglected Tropical Disease) माना जाता है। 
  • फाइलेरिया दुनिया भर के उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय देशों में एक गंभीर स्वास्थ्य समस्या है। जिसमें भारत भी शामिल है। विश्व में लगभग 1.3 अरब लोगों को इस बीमारी के संक्रमण का खतरा है और लगभग 12 करोड़ लोग इससे वर्तमान में संक्रमित हो चुके हैं, जिनमें से लगभग 4 करोड़ लोग इस बीमारी की वजह से किसी विकृति का शिकार हो गए हैं या अक्षम हो चुके हैं।
  • फाइलेरिया 2.5 करोड़ से ज्यादा पुरुषों को जननांग के विकार और 1.5 करोड़ से ज्यादा लोगों को सूजन से प्रभावित कर चुका है। हाथीपांव (Elephantiasis) फाइलेरिया का सबसे सामान्य लक्षण है जिसमें शोफ (Oedema) के साथ चमड़ी तथा उसके नीचे के ऊतक मोटे हो जाते हैं।

क्या हैं फाइलेरिया के लक्षण,filaria symptoms

इस तथ्य का अभी तक सटीक आकलन नहीं किया जा सका है कि संक्रमण के बाद फाइलेरिया के लक्षण प्रकट होने में कितना समय लगता है। हालांकि मच्छर के काटने के 16-18 महीनों के पश्चात बीमारी के लक्षण प्रकट होते हैं। फाइलेरिया के ज्यादातार लक्षण और संकेत वयस्क कृमि के लसीका तंत्र में प्रवेश के कारण पैदा होते हैं
  • कृमि द्वारा ऊतकों को नुकसान पहुंचाने से लसीका द्रव का बहाव बाधित होता है जिससे सूजन, घाव और संक्रमण पैदा होते हैं। पैर और पेड़ू सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले अंग हैं। फाइलेरिया का संक्रमण सामान्य शारीरिक कमजोरी, सिरदर्द, मिचली, हल्के बुखार और बार-बार खुजली के रूप में प्रकट होता है।
  • फाइलेरिया कभी-कभार ही जानलेवा साबित होता है, हालांकि इससे बार-बार संक्रमण, बुखार, लसीका तंत्र में गंभीर सूजन और फेफड़ों की बीमारी ‘ट्रॉपिकल पल्मोनरी इओसिनोफीलिया (Tropical Pulmonary Eosinophilia) हो जाती है। ट्रॉपिकल पल्मोनरी इओसिनोफीलिया के लक्षणों में खांसी, सांस लेने में परेशानी और सांस लेने में घरघराहट की आवाज होती है। लगभग 5 प्रतिशत मामलों में पैरों में सूजन आ जाती है जिसे फ़ीलपांव अथवा हाथीपांव कहते हैं। फाइलेरिया से गंभीर विकृति, चलने-फिरने में परेशानी और लंबी अवधि की विकलांगता हो सकती है।
  • फाइलेरिया के कारण हाइड्रोसील (Hydrocoele) भी हो सकता है। मरीज के वृषणकोष (Scrotum) में सूजन भी आ सकती है जिसे ‘फाइलेरियल स्क्रोटम’ (Filarial scrotum) कहा जाता है। कुछ मरीजों में मूत्र का रंग दूधिया हो जाता है। महिलाओं में वक्ष या बाह्य जननांग भी प्रभावित होते हैं। कुछ मामलों में पेरिकार्डियल स्पेस (हृदय और उसके झिल्लीदार आवरण के बीच की जगह) में भी द्रव जमा हो जाता है।

फाइलेरिया के कौन से कारक जीव

फाइलेरिया, फाइलेरियोडिडिया (Filariodidea) कुल के नेमैटोडों (गोलकृमि) के संक्रमण से होता है। तीन प्रकार के कृमि इस बीमारी को जन्म देते हैं। ये हैं वुचिरेरिया बैंक्राफ्टाई (Wuchereria bancrofti), ब्रुजिया मलाई (Brugia malayi) औरब्रुजिया टिमोरीई (Brugia timori)। वुचिरेरिया बैंक्राफ्टाई इस बीमारी का सबसे सामान्य कारक है जो पूरे विश्व में पाया जाता है।
  • ब्रुजिया मलाई दक्षिण-पश्चिम भारत, चीन, इंडोनेशिया, मलेशिया, दक्षिण कोरिया, फिलिपींस और वियतनाम में पाया जाता है जबकि ब्रुजिया टिमोराई सिर्फ इंडोनेशिया तक ही सीमित है। 
  • वुचिरेरिया बैंक्राफ्टाई में नर कृमि 40 मिलीमीटर लंबा होता है जबकि मादा की लंबाई लगभग 50-100 मिलीमीटर होती है।
  • फाइलेरिया भारत में एक प्रमुख स्वास्थ्य समस्या है। यह संक्रामक बीमारी देश के राज्यों उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, तमिलनाडु, गुजरात, केरल एवं केन्द्र शासित प्रदेशों लक्षद्वीप और अंडमान निकोबार में स्थाई रूप से उभरती रहती है। 
  • भारत में मुख्य तौर पर फाइलेरिया के दो प्रकार के संक्रमण होते हैं, एक वुचिरेरिया बैंक्राफ्टाई से और दूसरा ब्रुजिया मलाई से। वुचिरेरिया बैंक्राफ्टाई के संक्रमण से होने वाला बैंक्रोफ्टियन फाइलेरिया (Bancroftian filaria) भारत में फाइलेरिया के कुल मामलों का लगभग 98 प्रतिशत होता है

कैसे फैलता है फाइलेरिया

  • फाइलेरिया मच्छरों से फैलता है जो परजीवी कृमियों के लिए रोगवाहक का काम करते हैं। 
  • इस परजीवी के लिए मनुष्य मुख्य पोषक है जबकि मच्छर इसके वाहक और मध्यस्थ पोषक हैं। 
  • कृमि प्रभावित क्षेत्रों से लोगों का रोजगार की तलाश में बाहर जाना, शहरीकरण, औद्योगिकीकरण, अज्ञानता, आवासीय सुविधाओं की कमी और स्वच्छता की अपर्याप्त स्थिति से यह संक्रमण फैलता है। 
  • संक्रमण के बाद कृमि के लार्वा संक्रमित व्यक्ति की रक्तधारा में बहते रहते हैं जबकि वयस्क कृमि मानव लसीका तंत्र में जगह बना लेता है। एक वयस्क कृमि की आयु सात वर्ष तक हो सकती है।
  •  संक्रमित मच्‍छर के काटने से इसके कीड़े फैलते है। जब मनुष्‍य बच्‍चा होता है तो आम तौर पर संक्रमण आरंभ हो जाता है। तीन प्रकार के कीड़े होते है जिनके कारण बीमारी फैलती है: Wuchereria bancrofti, Brugia malayi, और Brugia timori. Wuchereria bancrofti यह सबसे सामान्‍य है। यह कीड़ा lymphatic system को नुकसान पहुंचाता है।
  •  रात के समय एकत्रित किए गए खून को, एक प्रकार के सूक्ष्‍मदर्शी के द्वारा देखने पर इस बीमारी का पता चलता है। खून को thick smear के रूप में और Giemsa के साथ दाग के रूप में होना चाहिए।. बीमारी के विरूद्ध एंटीबाडियों हेतु खून की जांच भी की जा सकती है।
  • यह शोथ न्यूनाधिक होता रहता है, परंतु जब ये कृमि अंदर ही अंदर मर जाते हैं, तब लसीकावाहिनियों का मार्ग सदा के लिए बंद हो जाता है और उस स्थान की त्वचा मोटी तथा कड़ी हो जाती है। लसीका वाहिनियों के मार्ग बंद हो जाने से यदि अंग फूल जाएँ, तो कोई भी औषध ऐसी नहीं है जो अवरुद्ध लसीकामार्ग को खोल सके। 
  • कभी कभी किसी किसी रोगी में शल्यकर्म द्वारा लसीकावाहिनी का नया मार्ग बनाया जा सकता है। इस रोग के समस्त लक्षण फाइलेरिया के उग्र प्रकोप के समान होते हैं।

फाइलेरिया का घरेलू इलाज

इलाज बीमारी की शुरुआती अवस्था में ही शुरु हो जाना चाहिए। याद रखना चाहिए कि हाथों या पैरों की सूजन ठीक करने के लिए हमारे पास कोई भी दवाई नहीं है। डाईइथाइल – कार्बामाज़ीन (DEC) फाइलेरिया की एक दवा है। इसे दो हफ्तों दिया जाना चाहिए। इस दवा से सिर में दर्द, मितली, उल्टी जैसी प्रतिक्रियाएं हो सकती हैं। कभी कभी इससे एलर्जी भी हो जाती है। आप इसके बारे में और अधिक दवाइयों वाले अध्याय में पढ़ सकते हैं।

फाइलेरिया पर नियंत्रण या रोकथाम phayaleriya-check फायलेरिया जॉंच के लिये खून का नमूना रात में लेना पडता है इस बीमारी कृमि के कई एक वाहक इलाज के लिए नहीं पहुँचते। इसलिए संक्रमणग्रस्त इलाकों में सभी की जांच ज़रूरी है। ऐसा न होने पर बीमारी फैलती जाती है। जिन क्षेत्रों में फाइलेरिया की समस्या हो वहॉं खास सर्वे किए जाने ज़रूरी होते हैं। फाइलेरिया के नियंत्रण के लिए रात को खून के आलेप के नमूने इकट्ठे करना, रोकथाम के लिये दवा प्रयोग और बीएचसी छिडकाकर मच्छरों पर नियंत्रण करना जैसे कदम उठाना ज़रूरी है। जिन क्षेत्रों में फाइलेरिया की बीमारी ज़्यादा होती है वहॉं नमक में DEC दवा मिलाना ठीक रहता है। इससे यह सुनिश्चित हो जाता है कि हर व्यक्ति को यह दवा मिल जाए (कम मात्रा में) और इससे सूक्ष्म फाइलेरिया कृमि को मारा जा सकता है।

ये सूक्ष्म फाइलेरिया कृमि खून में घूमते रहते हैं। ऐसा खासकर रात को होता है। क्यूलैक्स मच्छर जब खून चूसता है तो वो इन सूक्ष्म फाइलेरिया को अपने अंदर ले लेता है। और संक्रमण पैदा करने वाले लार्वा के रुप में इनका विकास 10 से 15 दिनों के अंदर होता है। इस अवस्था में मच्छर बीमारी पैदा करने वाला होता है। इस तरह यह चक्र चलता रहता है।

Thursday, January 11, 2018

दांत के दर्द का प्राकृतिक उपचार, Home Remedies for Teeth Pain in Hindi,



प्राकृतिक उपचार दंत पीडा में लाभकारी होते हैं। सदियों से हमारे बडे-बूढे दांत के दर्द में घरेलू पदार्थों का उपयोग करते आये हैं। यहां हम ऐसे ही प्राकृतिक उपचारों की चर्चा कर रहे हैं। असल में दांतों से जुड़ी हर समस्या के पीछे हमारी गलत खानपान और रहन-सहन की आधुनिक जीवन शैली है। चाय-कॉफी जैसे बेहद गर्म पेय तथा कोलड्रिक्स दोनों ही दांतों की जड़ों को कमजोर और खोखला कर देते हैं। सात्विक, ताजा तथा प्राकृतिक खानपान और सफाई के प्रति जागरूकता ही हमें दातों की समस्या से स्थाई छुटकार दिला सके। 
दांतों में दर्द होना बहुत ही आम बात है, लेकिन यह दर्द असहनीय होता है। हम दांतों की बहुत सारी तकलीफों से बच सकते अगर हम उनका धयान रखें। दांतों के दर्द से निवारण के लिए आप नीचे दिए गए Gharelu Nuskhe अपना सकते हैं।

 दांत के दर्द का प्राकृतिक उपचार, Home Remedies for Teeth Pain in Hindi,

    • कच्चा प्याज दांत के दर्द के लिए सबसे प्रभावशाली Gharelu Upchar है। एक ताज़ा प्याज काट कर दांतों पर 3 मिनट के लिए रगड़े। इससे दांतों के दर्द में आराम मिलेगा।
    • हींग दांतों के दर्द के लिए बहुत लाभदायक Gharelu Nuskhe में से एक है। जब भी दांत में दर्द हो तो हींग को मौसमी के रस में मिलाये और फिर रुई में लेकर उस रुई को दर्द करने वाले दांत पर रख दीजिये, इससे आपको दर्द से तुरंत निजात मिलेगी।
    • मसूड़े पर काली मिर्च के पाउडर को रगड़े, इससे मसूड़े सुन्न हो जायेंगे और दर्द काम हो जायेगा। यह gharelu upchar दांतों के लिए बहुत लाभदायक है।
    • बर्फ के टुकड़े से मसूड़े की सिकाई करें।
    • 5gm लौंग, 3gm कपूर को बारीक पीस कर दत्तो पर मलने से आराम मिलेगा। लौंग का तेल दांतों में लाएं, लेकिन धयान रहे की तेल मसूड़ों पर न लगे क्योंकि मसूड़े पर लगाने से उन पर जलन होती है।
    • लहसुन की एक लौंग चबाना भी दांतों के दर्द के लिए बहुत प्रभावी है।जिस दांत में दर्द हो उसके पास एक लौंग रखें। इससे दांत के दर्द में आराम आएगा।जिस दांत में दर्द हो, Vicks को अपने चेहरे के उस भाग पर लगाएं और किसी रुमाल से धक लें। Vicks की ऊष्मा से आपका दांतों का दर्द खत्म हो जायेगा 
    • टमाटर का सेवन करें, इससे दांत स्वस्थ और साफ़ रहते हैं। दांतों के दर्द में नमकीन पानी से गरारे करना बहुत लाभदायक है। हल्दी और सरसों के तेल को मिला कर दांतों का मंजन करें। दांत में दर्द होने पर, मीठा न खाए क्योंकि मीठा खाने से बैक्टीरिया और जर्म्स और भी ज्यादा बढ़ते है।
    • कैल्शियम और प्रोटीन युक्त खाने का सेवन करें। ताज़े आम के पत्तों को चबाएं और थूक दें।
    • दो ग्राम हींग नींबू के रस में पीसकर पेस्ट जैसा बनाले। इस पेस्ट से दंत मंजन करते रहने से दंतशूल का निवारण होता है।१२। मेरा अनुभव है कि विटामिन सी ५०० एम.जी. दिन में दो बार और केल्सियम ५००एम.जी दिन में एक बार लेते रहने से दांत के कई रोग नियंत्रित होंगे और दांत भी मजबूत बनेंगे।
    • मुख्य बात ये है कि सुबह-शाम दांतों की स्वच्छता करते रहें। दांतों के बीच की जगह में अन्न कण फ़ंसे रह जाते हैं और उनमें जीवाणु पैदा होकर दंत विकार उत्पन्न करते हैं।
    • शकर का उपयोग हानिकारक है। इससे दांतो में जीवाणु पैदा होते हैं। मीठी वस्तुएं हानिकारक हैं। लेकिन कडवे,ख्ट्टे,कसेले स्वाद के पदार्थ दांतों के लिये हितकर होते है। नींबू,आंवला,टमाटर ,नारंगी का नियमित उपयोग लाभकारी है। इन फ़लों मे जीवाणुनाशक तत्व होते हैं। मसूढों से अत्यधिक मात्रा में खून जाता हो तो नींबू का ताजा रस पीना लाभकारी है। हरी सब्जियां,रसदार फ़ल भोजन में प्रचुरता से शामिल करें।
    • दांतों की केविटी में दंत चिकित्सक केमिकल मसाला भरकर इलाज करते हैं। सभी प्रकार के जतन करने पर भी दांत की पीडा शांत न हो तो दांत उखडवाना ही आखिरी उपाय है।
     दांतों में पस मुख्य रूप से मसूड़ों में जलन और टूटे हुए दांत के कारण होता है। दांतों में पस मुख्य रूप से एक प्रकार का संक्रमण होता है जो मसूड़ों और दांतों की जड़ों के बीच होता है तथा इसके कारण बहुत अधिक दर्द होता है। इसके कारण दांत के अंदर पस बन जाता है जिसके कारण दांत में दर्द होता है।

    जिस दांत में पस हो जाता है उसमें बैक्टीरिया प्रवेश कर जाता है और वही बढ़ता रहता है जिससे उन हड्डियों में संक्रमण हो जाता है जो दांतों को सहारा देती हैं। यदि समय पर इसका उपचार नहीं किया गया तो इसके कारण जीवन को खतरा हो सकता है।

      Thursday, November 09, 2017

      पैर के मोच को कैसे ठीक करे,Home Remedies for a Sprained Ankle in Hindi,

      पैरों में मोच या फिर खिंचाव आने पर काफी सूजन और दर्द पैदा हो जाता है। यह कभी भी हो सकता है, चाहे आप खेल-कूद में लीन हो या फिर चलते चलते पैर मुड़ जाए। कई बार काम करते समय, खेलते कूदते सीढ़ी चढ़ते हमें यह मालूम ही नहीं हो पाता कि हमारे हाथ-पाँव या कमर में मोच लग गई है, लेकिन कुछ समय बाद उस जगह दुःखने पर हमें यह पता लगता है। मोच आने पर उस अंग पर सूजन आ जाती है और काफी दर्द होने लगता है , अगर आपको असहनीय दर्द या ज्यादा परेशानी है तो आप तुरंत डॉक्टर को दिखाएँ ,लेकिन यदि मोच छोटी है तो आप उस का घरेलू उपचार भी कर सकते है ।

      मोच, चोट और सूजन के कारण

      • मोच व चोट लगने का सबसे पहला कारण हमारी असावधानी हो सकती हैं. जैसे कई बार हम इतनी जल्दबाजी में होते हैं की हम सडक को पार करते हुए ध्यान ही नहीं देते और किसी दुर्घटना का शिकार हो जाते हैं
      • अधिक शारीरिक व्यायाम करने के कारण भी कई बार हमारे शरीर में मोच या अंदरूनी चोट लग जाती हैं. जिसका पता हमें व्यायाम करते समय नहीं चलता क्यूंकि व्यायाम करने से हमारे शरीर गरम हो जाता हैं.
      • बच्चों को अधिक चोट या मोच खेलते समय लगती हैं. 
      • अधिक तेजी से वाहन चलाने की वजह से भी कई बार लोगों को  चोट लग जाती हैं.

      मोच, चोट और सूजन के लक्षण

      • चोट या मोच लगने पर जिस भाग में चोट लगी हैं. वहां पर सूजन आ जाना.
      • चोट एवं मोच वाले स्थान में दर्द होना. 
      • चोट या मोच आने पर जिस भाग में चोट लगी हैं उसके आस – पास जलन होना.
      • चोट व मोच से प्रभावित त्वचा का लाला हो जाना.
      • अधिक चोट लगने पर खून बहना.
      • मोच आने पर त्वचा का रंग नीला हो जाना

      मोच, चोट और सूजन के लिए घरेलू उपाय,पैर के मोच को कैसे ठीक करे,Home Remedies for a Sprained Ankle in Hindi,

      • आक के पत्तों को गरम करके बाँधने से चोट अच्छी हो जाती है। सूजन दूर हो जाती है।
      • चोट के कारण कटे हुए स्थान पर पिसी हुई हल्दी भर देने से खून का बहना बंद हो जाता है तथा हल्दी कीटाणुनाशक भी होती है।
      • चोट व मोच के दर्द से राहत पाने के लिए तुलसी के पत्तों का उपयोग करना बहुत ही उपयोगी होता हैं. चोट व मोच को ठीक करने के लिए तुलसी के पत्ते लें और उसे पीस लें. अब इन पत्तियों के लेप को अपनी चोट व मोच पर लगा लें. इस लेप का प्रयोग करने से घाव जल्दी ही ठीक हो जाएगा तथा मोच भी ठीक हो जाएगी.
      • 2 कली लहसुन, 10 ग्राम शहद, 1 ग्राम लाख एवं 2 ग्राम मिश्री इन सबको चटनी जैसा पीसकर, घी डालकर देने से टूटी हुई अथवा उतरी हुई हड्डी जल्दी जुड़ जाती है।
      • लकड़ी-पत्थर आदि लगने से आयी सूजन पर हल्दी एवं खाने का चूना एक साथ पीसकर गर्म लेप करने से अथवा इमली के पत्तों को उबालकर बाँधने से सूजन उतर जाती है।
      • यदि आप के पैर में मोच आ गई है तो आप तेजपात को पीसकर मोच वाले स्थान पर लगायें ।
      • मोच अथवा चोट के कारण खून जम जाने एवं गाँठ पड़ जाने पर बड़ के कोमल पत्तों पर शहद लगाकर बाँधने से लाभ होता है।
      • अगर आपके पैर या हाथ में मोच आ गई है तो बिना देर किए थोडा सा बर्फ एक कपड़े में रखकर सूजन वाले जगह पर लगायें इससे सूजन कम हो जाता है। बर्फ लगाने से सूजन वाले जगह पर रक्त का संचालन अच्छी तरह से होने लगता है जिससे दर्द धीरे-धीरे कम होने लगता है।
      • हल्दी और सरसों के तेल को मिला लें और इसे हल्की आंच में गर्म करके फिर इसे मोच वाली जगह पर लगाएं और किसी कपड़े से इसे ढक दें।
      • अरनी के उबाले हुए पत्तों को किसी भी प्रकार की सूजन पर बाँधने से तथा 1 ग्राम हाथ की पीसी हुई हल्दी को सुबह पानी के साथ लेने से सूजन दूर होती
      • पका हुआ लहसुन और अजवायन को सरसों के तेल में मिलाकर गर्म करें। और फिर इस तेल की मालिश मोच वाले हिस्से पर करें। आपको राहत मिलेगी।
      • महुआ और तिल को कपड़े में बांध कर लगाने से हड्डी की मोच ठीक हो सकती है।
      • 1 से 3 ग्राम हल्दी और शक्कर फाँकने और नारियल का पानी पीने से तथा खाने का चूना एवं पुराना गुड़ पीसकर एकरस करके लगाने से भीतरी चोट में तुरंत लाभ होता है|
      • एलोवेरा के गूदे को सूजन और मोच वाली जगह पर लगाने से आराम मिलता है।
      • इमली की पत्तियों को पीसें और इसे आग में थोड़ा गुनगुना करें। और इसे मोच वाली जगह पर लगाने से दर्द से तुरंत राहत मिलती है।
      • ढ़ाक के गोंद को पानी में मिलाकर उसका लेप करने से चोट में सूजन सही हो जाती है ।
      • मोच को ठीक करने का एक और कारगर उपाय यह है कि आप अनार के पत्ते पीसकर मोच वाली जगह पर मलें।
      • चोट किसी भी स्थान पर लगी हो तो आप कपूर और घी की बराबर मात्रा में मिलाकर चोट वाले स्थान पर कपडे से बांधे एैसा करने से चोट का दर्द कम हो जाता है तथा रक्त बहना भी बंद हो जाता है।
      • सरसों के तेल में नमक को मिला लें और इसे गर्म करके मोच वाली जगह पर लगाएं। एैसा करने मोच में राहत मिलती है।
      • हाथ पैरों की ऐठन और पैर की मोच पर अखरोट का तेल लगाने से दर्द से राहत मिलती है।
      • चूने को शहद के साथ मिला लें और इससे मोच वाली जगह पर आराम से मालिश करें। इस उपाय से भी मोच में बहुत राहत मिलती है।
      • मोच को ठीक करने के लिए सरसों के तेल का प्रयोग करना बहुत ही लाभकारी सिद्ध होता हैं. मोच से जल्दी राहत पाने के लिए सरसों के तेल को मोच वाले स्थान पर लगा लें और इस पर हल्दी का पाउडर छिडक लें. हल्दी को छिडकने के बाद मोच को तौलिए से ढक दें. अब एक पोटली लें और उसमे नमक डाल लें और इसे बांध लें. अब इस पोटली को तवे पर गर्म करके तौलिए के उपर से गर्माहट सहन करने लायक सिकाई कर लें. आपकी मोच ठीक हो जाएगी.

      Sunday, October 08, 2017

      रेबीज का उपचार,Rabies Treatment in Hindi,

      रेबीज का उपचार,Rabies Treatment in Hindi,

      रेबीज का उपचार,Rabies Treatment in Hindi,

      रेबीज नामक रोग प्राचीन रोगों में से एक है। एक बार इस रोग के लक्षण उत्पन्न हो जाएं तो मृत्यु होने की संभावना बड़ जाती है। इस बीमारी के बारे में लोगों को ज्यादा जानकारी नहीं होती। 

      विश्व रेबीज दिवस की शुरुआत इंग्लैण्ड की एक संस्था ग्लोबल अलायंस फॉर रेबीज कंट्रोल द्वारा वर्ष 2007 में की गई थी। तभी से हर वर्ष रेबीज़ के टीके के जन्मदाता लुईस पाश्चर के निधन दिवस 28 सितंबर के ही दिन इसे मनाया जाता है।

      रेबीज एक विषाणुओं द्वारा होने वाला संक्रमक रोग है। इसका यह विषाणु ज्यादातर जानवरों जैसे कुत्ते, बिल्ली, चूहे अन्य आदि में पाया जाता है। इस रोग के विषाणु 0.0008 मि.मी लंबे और 0.00007 मि.ली व्यास वाले होत है। जानवरों द्वारा यह रोग इंसानों में फैलता है।

      रेबीज को हाइड्रोफोबिया भी कहा जाता है। यह पशुओं से फैलने वाला वायरल जूनोटिक इन्फेक्शन है। इससे इनकेफोलाइटिस जैसा उपद्रव होता है, जो निश्चित रूप से चिकित्सा न किए जाने पर घातक होता है। इसका प्रमुख कारण किसी पागल कुत्ते का काटना होता है।

      रोग के प्रारंभिक लक्षण 

      • सिर दर्द, बुखार, मितली आना, भूख न लगना, असहाय पीड़ा और प्रभावित क्षेत्र में जलन आदि। 
      • इसी के साथ व्यक्ति में तनाव, भय और उत्तेजना की वृद्धि होती है। 
      • मांसपेशियों में जकड़न, पीया पानी बाहर आना। 
      • इसलिए इस रोग का नाम जल आतंक अर्थात् हाइड्रोफोबिया रखा गया है। 
      • इसलिए व्यक्ति को ऐसे लक्षण दिखने पर तुरंत डॉक्टर के पास जाना चाहिए क्योंकि इसके चलते मौत भी हो सकती है। 

      रेबीज का इलाज - क्या करें काटने के बाद

      कुत्ते के काटने के बाद उस हिस्से को सबसे पहले पानी से खूब अच्छी तरह धोएं। फिर साबुन लगा कर धोएं। वहां पट्टी कतई न बांधें। पहला ऐंटि-रेबीज इंजेक्शन 24 घंटे के भीतर जरूर लगवा लें। 
      • कुत्ते, बिल्ली या बंदर के काटने को हल्के में लेना बड़ी भूल है। इससे जानलेवा रेबीज हो सकता है।
      • कुत्ते के काटने के बाद अब भी कई लोगों को यह लगता है कि पेट में 14 इंजेक्शन लगेंगे। यह गलत है। वैक्सिनेशन के तरीके और टाइम पीरियड अब बदल चुके हैं। यह भी जान लेना जरूरी है कि कुत्ते, बिल्ली या बंदर के काटने पर आपके काम का डॉक्टर जनरल फिजिशन (फैमिली डॉक्टर) ही है।
      • रेबीज को रोकने के लिए प्रॉपर वैक्सिनेशन (ऐंटि-रेबीज वैक्सिनेशन) की जाती है।
      • ऐंटि-रेबीज वैक्सीन सेंट्रल नर्वस सिस्टम (जहां रेबीज के वायरस अटैक करते हैं) पर रक्षात्मक परत बना कर उस वायरस के असर को खत्म कर देती है।
      • वैक्सिनेशन दो तरह से की जाती है: ऐक्टिव और पैसिव।अगर जख्म गहरा हो तो ऐक्टिव वैक्सिनेशन के तहतदो इंजेक्शन फौरन लगते हैं। इसमें ऐंटि-रेबीज सीरम कोपहले मसल्स (बाजू या हिप्स) में और फिर ठीक उस जगह पर जहां कुत्ते, बिल्ली या बंदर ने काटा हो, इंजेक्शन के जरिए डाला जाता है।
      • इसके बाद बारी आती है पैसिव वैक्सिनेशन की। इसमें पांच इंजेक्शन एक खास टाइम पीरियड में लेने पड़ते हैं।
      • पहला इंजेक्शन-काटने के पहले दिन
        दूसरा इंजेक्शन-काटने के तीसरे दिन
        तीसरा इंजेक्शन-काटने के सातवें दिन
        चौथा इंजेक्शन-काटने के 14वें दिन
        पांचवां-काटने के 28वें दिन

      • आमतौर पर पैसिव वैक्सिनेशन ही किया जाता है। लेकिन ज्यादा जख्म होने पर ऐक्टिव और पैसिव, दोनों तरह का वैक्सिनेशन किया जाता है। वैक्सिनेशन को बीच में छोड़ना या समय से न लेना खतरे को बढ़ावा देना है। चूंकि हमारा देश जानवरों के काटने से फैलने वाली बीमारियों के असर में है, इसलिए डॉक्टर सलाह देते हैं कि लोगों को प्री-एक्सपोजर वैक्सिनेशन (काटने के पहले) जरूर लेना चाहिए। इसके तहत तीन इंजेक्शन लगाए जाते हैं। तीनों इंजेक्शन का कोर्स जरूरी है।
      • प्री-एक्सपोजर वैक्सिनेशन का असर दो साल तक रहता है। इस दरम्यान अगर कुत्ता, बिल्ली या बंदर काटता है तो रेबीज की आशंका नहीं रहती। फिर भी अगर जख्म गहरा हो तो आप डॉक्टर से दिखाकर उसकी राय जरूर लें और अगर वह कहे कि ऐक्टिव या पैसिव वैक्सिनेशन की दरकार है तो उसके लिए जरूर जाएं।
      • पालतू कुत्ते के साथ भी सावधानी बरतनी चाहिए। आप उसका पूरा वैक्सिनेशन कराएं, ताकि उसके शरीर में रेबीज का वायरस न पनपे। अगर आप दूसरे से बड़ा कुत्ता ले रहे हैं तो भी उसके वैक्सिनेशन के बारे में जरूर पूछें।
      • वैक्सिनेशन कराने पर प्राइवेट हॉस्पिटल में करीब 2 हजार रुपए का खर्च बैठता है। ऐसे करें बचाव
      • कुत्ते, बिल्ली या बंदर अमूमन किसी को काटने नहीं दौड़ते, लेकिन रेबीज इन्फ़ेक्टेड जानवर आपको परेशान कर सकते हैं।
      • सामान्य कुत्ते भी आपकी परेशानी का सबब बनते रहते हैं। ऐसे में आपको अपना बचाव खुद करना पड़ता है

      Saturday, August 19, 2017

      जानिए क्या है डीप वेन थ्रोम्बोसिस-What Is Deep Vein Thrombosis In Hindi,

      डीप वेन थ्रोमबोसिस (डीवीटी) बीमारी है शरीर की नसों में ख़ून जमने की. ये ब्लड क्लॉट आम तौर पर पैरों की नसों में पाए जाते हैं. हालांकि ये एक बहुत ही आम बीमारी है लेकिन अनदेखी करने पर थ्रोमबोसिस जानलेवा भी हो सकती है. रक्त वाहिकाओं में जब खून का थक्का जम जाता है तब उसे थ्रोम्बोसिस कहते हैं. अगर यह शरीर के भीतरी नसों में होता है, तो उसे ‘डीप वेन थ्रोम्बोसिस’ कहते हैं. यह अकसर पैर की नसों में होता है. यह बीमारी खतरनाक रूप तब लेती है जब यह खून का थक्का, पैर से निकल कर फेफड़ों तक पहुंच जाता है.

      डीप वेन थ्रोम्बोसिस दो प्रकार के कारणों से हो सकता है.

      1- खून का बहाव धीरे है या रुक गया है. जैसे...

      • किसी बीमारी या गर्भ में बिस्तर पर लेटे रहने से
      • अधिकतर खड़े होकर काम करते हैं, जैसे कि अध्यापक, नर्स, सर्जन या अन्य.
      • लंबे समय तक पैर नहीं चलाते हैं, जैसे कि बहुत देर का विमान यात्रा
      • दूसरा कि खून में जमने का प्रवृती बढ़ गई है

      2- सामान्य स्थिती में यहाँ दोनों तरह के पदार्थ संतुलित मात्रा में रहते हैं. अगर किसी कारण से यह संतुलन बिगड़ता है, तो नसों के अंदर खून जम सकता है. जैसे...

      • किसी भी प्रकार का सर्जरी, जो कि पैर, जांघ, कमर या पेल्विस पर की गई हो.
      • कैंसर होने से डीप वेन थ्रोम्बोसिस का खतरा बढ़ जाता है.
      • धूम्रपान करने से डीप वेन थ्रोम्बोसिस का खतरा बढ़ जाता है.
      • दिल का बीमारी होने से, जिसमें दिल कमजोर हो जाता है. इसे कांजेसटिव हार्ट फैलिअर (congestive heart failure) कहते हैं. इस स्थिती में ह्रदय खून को पम्प करने में सक्षम नहीं होता और खून पैरों में जमा होने लगता है.
      • पैर के नसों के कमजोरी से भी खून पैरों में जमा होने लगता है. सामान्य स्थिती में खून को पैर से दिल के तरफ लौटना चाहिए लेकिन इस अवस्था में पैर में खून जाने के लिए एक वाल्व होता है, जो खून के बहाव को ह्रदय की तरफ रखता है. अगर नसों के वाल्व में कमजोरी आ जाती है, तो खून के बहाव में भी रूकावट आ जाती है, और फिर पैर में खून जमा होने लगता है. महिलाओं में ये इन अवस्थाओं में अधिक होता है यदि...
      • आप गर्भ निरोधक गोली (oral contraceptive pills) लेती हैं
      • अगर आप मोटापे से पीड़ित हैं
      • अगर आपका मेनोपौज़ (menopause) हो चुका है

       डीप वेन थ्रोम्बोसिस ke लक्षण

      पहली अवस्था में इसका कोई लक्षण नहीं होता. लेकिन जब खून के थक्के जमा होने लगते है, तब इसके लक्षण प्रकट हो जाते हैं. यह लक्षण पैरों में होते हैं यानी तलवे से लेकर जांघ तक कोई भी जगह
      • पैर का फूलना
      • पैर में दर्द होना
      • पैर लहराना
      • पैर में अत्यन्त खुजली होना
      • पैर का रंग बदलना - लाल या नीला पड़ जाना

      यूं करें जांच

      • सोनोग्राम (sonogram) - मशीन द्वारा बाहर से नसों का फोटो खींचा जा सकता है.
      • वेनोग्राफी (contrast venography) - नसों में सुई द्वारा रंग दिया जाता, और फिर उसका फोटो खीचा जाता है
      • इम्पेडांस प्लेथिस्मोग्राफी (impedance plethysmography) - इसमें बिजली के तरंगों से इस रोग को जांचा जाता है

      डीप वेन थ्रोम्बोसिस की रोकथाम

      • पैर मांसपेशियों की गतिविधियों में बैठे की लंबी अवधि के दौरान वृद्धि पैरों में रक्त के प्रवाह को बेहतर बनाता है। इस चलने के आसपास केबिन या आपके कम पैर और जबकि बैठा टखने कसरत शामिल हो सकते हैं।
      • पानी का खूब सेवन, और कुछ भी शराब या उसमें कैफीन के साथ शराब पीने से बचें।
      • ढीले-ढाले कपड़े पहन लो।
      • कुछ लंबे समय लोगों को लंबे समय तक निष्क्रियता से बचने के लिए, के बजाय कम naps लेने की सिफारिश।
      • नियमित रूप से व्यायाम, एक स्वस्थ वजन को बनाए रखने, और सिगरेट नहीं पीता।
      • यदि आप जोखिम वाले कारकों में से किसी के लिए DVT है, तो लंबे दौरों से पहले अपने चिकित्सक से परामर्श करें।

      क्या है इसका इलाज

      • डीप वेन थ्रोम्बोसिस’ में खून के थक्कों को गलाने के लिए दवा दी जाती है. इसके लिए हॉस्पिटल में एडमिट होना जरुर है क्योंकि इसकी दवा खून को पतला करती है जिसके लिए कई बार खून की जाँच की जाना जरुरी होता है. 
      • इस दवा को कम-से-कम 6 माह तक दिया जाना जरुरी होता है. इसके साथ ही उन कारणों को भी पहचान कर दूर करना होता है जिस वजह से ‘डीप वेन थ्रोम्बोसिस’ बीमारी होती है.

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